
डर
गहरी रात में
दूर कहीं से
आती लावारिश कुत्तों की आवाजें
बेहद डरावनी लगती हैं
फिर भी डरो नहीं
सो जाओ बच्चों
बचपन से ही
परिचित हूँ मैं ऐसी आवाजों से
कभी डरावनी रस्मयी
कभी फफक -फफककर रोने की
कभी झूंड में ठहाकों की गूंज
कभी अपने में लड़ने -झगड़ने की
ये सब सुन -सुनकर ऊब गया हूँ
मेरे कान पक गए है
इसी तरह
जो जानते -समझते हैं उन्हें
वे डरते नहीं ,घबराते नहीं
मुकाबला करते है रूबरू
तोड़ देते है
उनके नुकीले दाँत…
चलो सो जाओ
तुम्हारे कहने के बावजूद
नहीं सुनाऊंगा कोई कहानी
नहीं दोहराऊंगा दादी का कहा
कि एक था राजा
एक थी रानी
तुम जानो, तुम समझो
ना राजा था, ना रानी
वे दरिन्दें थे
ख़ून चूसने वाले थे
उनकी भूख मिटाने के लिए
मज़लूमों के मांस के लोथड़े नित
पेश करते थे उनके सेनापति
जिनका इतिहास बनाना चाहिए था
वही तो उनके निवाले थे
सिर्फ उनकी हड्डियाँ
अवशेष के रूप में
ढही पुरानी इमारतों के ज़मीदोज़
मकबरे से निकल रही
उनको शर्तिया मालूम होगा कि
जो हम डर के महल बना रहे है
उसे एक दिन वह मुफलिस
पत्थर मारेगा काँच की खिड़की पर
तोड़ देगा सजाए हुए डर को !



