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फिलीपीन के फिल्म निर्माता ब्रिलियंटे मेंडोज़ा ने इफ्फी 54 में मास्टरक्लास का आयोजन किया।

पणजी/गोवा 22 नवंबर।स्वतंत्र फिल्म निर्माता और फिलीपीन के ‘न्यू वेव सिनेमा’ के जीवंत प्रणेताओं में से एक, ब्रिलिएंट मेंडोज़ा ने फिल्म निर्माण की अपनी अनूठी प्रक्रिया से मंत्रमुग्ध दर्शकों को अवगत कराया। मेंडोज़ा गोवा में 54वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के मौके पर आयोजित पहली मास्टरक्लास की अगुवाई कर रहे थे।
इस मास्टरक्लास की शुरुआत मेंडोज़ा की व्यापक रूप से प्रशंसित फीचर फिल्म ‘मा’रोसा’ के लिए पर्दे के पीछे किए गए जमीनी कार्यों की एक दुर्लभ झलक के साथ हुई। मेंडोज़ा ने स्पष्ट किया कि वह एक निर्धारित पटकथा के बजाय अपनी कहानी को अपनी फिल्म की दिशा देने देते हैं। पात्रों के विकास की एक अत्यंत नवीन एवं गहन प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताते हुए, उन्होंने कहा कि वह अपने अभिनेताओं को कोई पटकथा या निर्धारित संवाद प्रदान नहीं करते हैं, बल्कि उन्हें बस अपने पात्रों की मूल स्थितियों में रख देते हैं। उनके निर्देशन का ब्रांड मजबूत आपसी विश्वास द्वारा निर्देशित होता है जहां वह अभिनेताओं की स्वाभाविक सहज प्रतिक्रियाओं को हावी होने देते हैं।
अभिनेता पात्रों की नियति को नहीं जानते हैं और वे जिन पात्रों की भूमिका निभाते हैं उनकी मानवीयता के साथ वास्तव में एकाकार हो जाते हैं। जैसे ही अभिनेता मेंडोज़ा द्वारा बुनी गई खूबसूरत सिनेमाई दुनिया के भीतर पात्र की भूमिका में जीवन का अनुभव करते हैं, वे पात्र जीवंत हो उठते हैं।
अपने प्रोडक्शन डिज़ाइन के बारे में बोलते हुए, मेंडोज़ा ने बताया कि उनके प्रोडक्शन में हरेक विवरण एक कहानी कहने के लिए एकत्रित होता है। उन्होंने बताया कि वह अपने पात्रों के प्रति पूरी तरह प्रामाणिक बने रहने के लिए किसी कृत्रिम सेट का उपयोग नहीं करते बल्कि केवल वास्तविक स्थानों का उपयोग करते हैं।
हालांकि शीर्षकों के प्रति व्यक्तिगत रूप से उदासीन, मेंडोज़ा की सिनेमैटोग्राफी और समग्र फिल्म-निर्माण के ब्रांड को अक्सर ‘अति-यथार्थवादी’ कहा जाता है। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि वह किसी तिपाई का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि उनका कैमरा बस चरित्र का अनुसरण करता है और एक ऐसे प्रेक्षक का दृष्टिकोण देता है जो अंतरंग रूप से कहानी से साथ जुड़ा है। मेंडोज़ा सिनेमा को सच्चाई और यथार्थवाद के चश्मे से देखते हैं। उन्होंने कहा कि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि सिनेमा को जीवन को वैसे ही निरूपित करना चाहिए जैसी वह है। उन्होंने वास्तव में यह बताया कि उनकी एक फीचर फिल्म को गलती से एक फिल्म समारोह में ‘वृतचित्र’ खंड में शामिल कर लिया गया था। मेंडोज़ा ने कहा कि उस गलती को उन्होंने एक सराहना के रूप में लिया।
उन्होंने बताया कि उनकी फिल्मों में ध्वनि अपने आप में एक पात्र होती है। विभिन्न दृश्यों में सूक्ष्मता से बुनी गई, ध्वनि पूरी तरह से मौलिक होती है और इसकी अपनी एक पहचान होती है। इसे कभी भी हटाया नहीं जाता है और यह दर्शकों को कहानी के परिवेश को सुनने और महसूस करने में मदद करती है। संपादन प्रक्रिया के बारे में बोलते हुए, मेंडोज़ा ने कहा कि यह उनकी तीन चरण की फिल्म निर्माण प्रक्रिया का तीसरा और अंतिम चरण होता है जो विचार व तैयारी से शुरू होता है और फिर शूटिंग और प्रोडक्शन से गुजरते हुए आगे बढ़ता है। उन्होंने बताया कि संपादक की मेज पर विभिन्न दृश्यों को एकत्रित करते हुए फिल्म को एक साथ गूंथा जाता है, जहां हरेक दृश्य अगले दृश्य में सहजता से प्रवाहित होता है।
एक फिल्म निर्माता के रूप में अपने बारे में बात करते हुए, मेंडोज़ा ने इस तथ्य का खुलासा किया कि उन्होंने पैंतालीस वर्ष की उम्र तक फिल्में बनाना शुरू नहीं किया था। विज्ञापन में उनकी लंबी पृष्ठभूमि, जो बिक्री और उत्पाद वृद्धि द्वारा निर्देशित होती है, जो अक्सर सतही होती है, ने उन्हें अपनी फिल्मों में पूर्ण विपरीत तलाशने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया किया कि प्रामाणिकता उनकी फिल्मों की प्राथमिक धुरी है और वह आकर्षक बनने की कोशिश नहीं करते, बल्कि कहानियां सुनाते समय दुखद, बदसूरत और सुंदर पहलुओं से समान रूप से प्रेरित होते हैं।
उन्होंने साझा किया कि उनके पास कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है और वह मार्गदर्शन पाने के लिए केवल अपने अनुभवों का उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका निर्णायक मोड़ तब आया जब उनकी पहली फीचर फिल्म ‘द मसूर’ से दर्शकों ने जुड़ाव महसूस किया। उन्होंने बताया कि यह फिल्म उनके देश की सच्ची कहानी है जब वह अपनी जड़ों के सबसे करीब थे। यह उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। मेंडोज़ा ने कहा, “मैं सिनेमा में विश्वास करता हूं। मेरा मानना है कि सिनेमा जीवन को बेहतर बना सकता है।” मसूर ने लोकार्नो (2005) में गोल्डन लेपर्ड जीता था।
उन्होंने बताया कि वह लोगों के लिए फिल्में बनाते हैं और अपनी फिल्मों को परिभाषित करने का काम उन पर छोड़ देते हैं। भारतीय दर्शकों के बारे में बोलते हुए, उन्होंने कहा कि वे उन कहानियों से जुड़ते हैं जिन्हें वह कहने की कोशिश कर रहे हैं। मेंडोज़ा ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति किसी फिल्म से जुड़ जाता है, तो यह उसके जीवन का हिस्सा बन जाता है, यही कहानी कहने की ताकत है।”
उभरते हुए निर्देशकों को संबोधित करते हुए, उन्होंने कहा, “आपको खुद को फिल्म निर्माता के रूप में ढूंढना होगा और अपनी कला के प्रति सच्चे रहना होगा।” “यह आसान नहीं होने वाला है। फिल्म निर्माण सिर्फ एक जुनून नहीं है बल्कि सच्ची कहानियां कहने की प्रतिबद्धता है।”

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