
RKTV NEWS/ अनिल सिंह 25 अगस्त। RKTV NEWS शिक्षक दिवस को लेकर “शिक्षक सम्मान” के तहत समाज के विभिन्न वर्गो के लोगो से उनके शिक्षक के प्रति सम्मान को प्रदर्शित करने का प्रयास कर रही है इसी कड़ी में हमने आरा नगर निगम के पूर्व पार्षद सह चर्चित समाजसेवी स्वर्ण कुंज महाराणा प्रताप नगर , आरा निवासी डॉ जितेंद्र शुक्ला से उनके शैक्षणिक काल की चर्चा की तो उन्होंने बताया शिक्षक के बगैर चरित्र निर्माण और संस्कार की कल्पना करना भी बेमानी है । माता पिता के बाद शिक्षक वैसे शिल्पकार है जो बच्चों में बहुमुखी प्रतिभा का सर्वांगीण विकास करते हैं । बाल्यकाल से ही बच्चों के विकास के लिए माता पिता प्रयत्नशील हो जाते हैं ,

इस प्रकार प्रथम गुरु माता पिताजी के चरणों में कोटि कोटि नमन है। बाल्यकाल के बाद जब बच्चे विद्यालय जाते हैं तो आदरणीय गुरुवर जो शब्द का ज्ञान कराते है वैसे समस्त गुरुवर के चरणों में कोटि कोटि नमन है। मेरे जीवन काल मे प्रथम गुरु मेरी माताजी ही थी , संयुक्त परिवार में लालन पालन हुआ माताजी का परिवार के प्रति समर्पण के लिए कोई शब्द नहीं है, वैसे लोग अद्वितीय होते हैं । बचपन से माताजी का यह व्यवहार सदैव प्रभावित करते हुए मन-मस्तिष्क पर हावी होते गया और बाल्यकाल से ही परिवार के प्रति समाज के प्रति एक दायित्व का निर्माण होने लगा। उम्र के साथ साथ शिक्षा ग्रहण का कार्य भी आगे बढ़ता रहा । बाल्यकाल से ही बहुत सारे शिक्षकों का व्यवहार प्रभावित करते रहा जैसे जैसे पढ़ाई आगे बढ़ती रही बहुत सारे शिक्षकों से रुबरु होते रहा । मेरे जीवन को मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ० रामचंद्र सिंह जी ने बहुत ही प्रभावित किया उनका छात्रों के प्रति अपार स्नेह बेमिसाल था , पढ़ाने की शैली तो लाजवाब थी , सबसे बड़ी बात शिक्षण का माहौल घरेलू और पारिवारिक तरह का होता था जैसे हम उनके सगे बच्चे हो। जैन कालेज के रसायन शास्त्र के प्रोफेसर श्री निवास पाण्डेय जी का अभिभावक तुल्य स्नेह मिलता था अपितु मै कला का विधार्थी था फिर भी उनके स्नेह का कायल था । विश्वविद्यालय स्तर पर आने पर हिंदी के जाने-माने विद्वान तत्कालीन छात्र कल्याण को सुशोभित करनेवाले डॉ० दुर्ग विजय सिंह जी का अपार स्नेह और अनुशासन का पाठ मिलता रहा जो जीवन को दिशा प्रदान करने में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ । मेरे रिसर्च के दौरान इतिहास और अंग्रेजी के विद्वान डॉ० कौलेश्वर राय का भी अपार स्नेह प्राप्त हुआ जिनके निर्देशन में पीएचडी की मानद उपाधि प्राप्त हुआ।

शैक्षणिक कार्यों के साथ साथ अध्यात्मिक गुरु का भी सानिध्य प्राप्त हुआ जो सनातन संस्कृति एवं धर्मपरायणता के मार्ग पर चलने की सीख प्रदान की , इस कड़ी में परम आदरणीय नलिन बाबा , डॉ० लक्ष्मी नारायण चौबे जी महाराज का बहुत बड़ा योगदान रहा। परम आदरणीय डॉ० लक्ष्मी नारायण चौबे जी महाराज के निर्देशानुसार भगवत स्वरूप पूरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज से गुरु दीक्षा ली गई । बाल्यकाल से प्रौढ़ावस्था तक जीवन में जितने भी परम आदरणीय गुरुदेवों का आगमन हुआ सबका मेरे जीवन को संवारने में अमूल्य योगदान है । उनके आशीर्वाद से आज पूरी निष्ठा और लगन के साथ सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक गतिविधियों में रचनात्मक सोच के साथ गरीब गुरबो समाज के अंतिम पायदान पर जीवन बसर करनेवाले लोगों के साथ आत्मीय संबंध रखते हुए सदैव सेवा के लिए कृतसंकल्प है । गुरुदेव की असीम कृपा से “” सर्वे वसुधैव कुटुम्ब कम “” “” बहुजन हिताय बहुजन सुखाएं “” के परिकल्पना के साथ जीवन के अंतिम पर तक आगे बढ़ते रहना है।

विवाह उपरांत पत्नी भी कभी कभी गुरु की भूमिका में नजर आती है जिसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता , वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए पत्नी को गुरु रुप में स्वीकार करने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए।पुनः एक बार जीवन को सजाने-संवारने वाले माता पिता समेत शैक्षणिक गुरुओं एवं आध्यात्मिक गुरुओं के चरणों में कोटि कोटि नमन है।
