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पटना का नाम पाटलिपुत्र करने की मुख्यमंत्री की घोषणा का हो रहा है स्वागत।

इस आंदोलन के पुरोधा रहे डा अनिल सुलभ ने बधाई दी और शीघ्र कार्यान्वयन के लिए किया आग्रह।

RKTV NEWS/पटना(बिहार)19 जून। विगत 17 जून को फुलवारी शरीफ़ के एक आयोजन में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा पटना का नाम ‘पाटलिपुत्र’करने की हुई घोषणा से नगरवासी ही नहीं बिहार के सभी सुबुद्ध नागरिक हर्षित हैं। इस सदी के आरम्भ में ही, ‘पाटलिपुत्र जागरण अभियान समिति’ के तत्त्वावधान में, पटना का नाम परिवर्तन कर, ‘पाटलिपुत्र’ करने हेतु चलाए गए जन-आंदोलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए, मुख्यमंत्री को बधाई देते हुए, अभियान समिति और पटना के नागरिकों की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित की है तथा इसके शीघ्र कार्यान्वयन का आग्रह किया है।

मुख्य मंत्री को लिखे बधाई और स्वागत पत्र में डा सुलभ ने स्मरण दिलाया है कि पूरे संसार में पहली बार किसी नगर के नाम-परिवर्तन का आंदोलन इसी नगर में, हमसे पूर्व, पिछली सदी के ९वें दशक में सेना से अवकाश प्राप्त सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एस के सिन्हा ने आरम्भ किया था। उस समय भी नगर का व्यापक समर्थन मिला, किंतु इसकी परिणति नहीं हो पायी। जेनरल सिन्हा राज्यपाल बना दिए गए और वह आंदोलन वहीं समाप्त हो गया। पटना का नाम परिवर्तित कर ‘पाटलिपुत्र’ करने के आंदोलन आरम्भ होने के पश्चात देश और दुनिया के अनेक नगरों, यहाँ तक कि देशों के नाम बदले गए, किंतु संसार का सबसे प्राचीन जन-अभिलाषा की पूर्ति आज तक नही हो पायी है। अपने प्रदेश में भी ‘गया’, ‘गयाजी’ हुआ, पर पटना, अबतक ‘पाटलिपुत्र’ नहीं हो सका, जबकि यह सर्वाधिक पात्रता रखने वाला नगर है। वास्तव में एक हज़ार वर्षों का पाटलिपुत्र का गौरवशाली इतिहास ही भारत का स्वर्णिम इतिहास है। डा सुलभ ने उन्हीं दिनों लिखे गए अपने आलेख ‘कब आज़ाद होगा पाटलिपुत्र’ की प्रति भी पत्र के साथ संलग्न की है।

स्मरणीय है कि डा सुलभ की अध्यक्षता में इस अभियान समिति ने पटना के विभिन्न सभागारों में ही नहीं, अपितु नुक्कड़-नुक्कड़ पर जन-सभाएँ की थी, जिसे सभी वर्गों, संप्रदायों और विचारों के लोगों का अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ था। नगर के सभी महत्त्वपूर्ण स्थलों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकार इस मांग के समर्थन में सहयोग और सरकार से निर्णय के लिए अनुरोध किया गया था। इस जन-आंदोलन से नगर के हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सभी धर्मों के लोग, प्रबुद्ध जन, शिक्षाविद, साहित्यकार और सभी दलों के राजनेता जुड़े हुए थे। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो सिद्धेश्वर प्रसाद, बिहार विधान परिषद के तत्कालीन सभापति प्रो अरुण कुमार, पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा एस एन पी सिन्हा, मगधविश्वविद्यालय के कुलपति मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’, बिहार अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष जनाब हारुन रशीद,कैथोलिक ऐसोशिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष श्री अनिल सेसिल साह आदि बड़ी संख्या में विभिन्न समुदाय के लोग सम्मिलित थे। इस आंदोलन का समर्थन आगे चलकर बिहार के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री आर एस गवई ने भी की थी और इस हेतु मुख्यमंत्री जी को पत्र भी लिखा था।
बिहार विधान परिषद में इस हेतु सदन के माननीय सदस्य श्री आज़ाद गाँधी ने एक संकल्प भी लाया था, जिस पर सदन में उपस्थित अनेक मंत्रियों ने एक साथ खड़े होकर यह आश्वासन दिया था कि पटना का विस्तार कर एक महानगर बनाया जा रहा है, जिसका नाम ‘पाटलिपुत्र’रखा जाएगा, जिसके आलोक में सरकार के आग्रह पर संकल्प वापस लिया गया था। सरकार की ओर से आश्वासन देने वालों में तत्कालीन मंत्री श्री नन्द किशोर यादव (नागालैंड के वर्तमान राज्यपाल), श्री प्रेम कुमार ( बिहार विधान सभा के वर्तमान अध्यक्ष), श्री अश्विनी चौबे (पूर्व केंद्रीय मंत्री), श्री जनार्दन सिंह सिग्रिवाल (वर्तमान सांसद) सम्मिलित थे।

इस आश्वासन से आश्वस्त होकर पाटलिपुत्र जागरण समिति इतनी प्रसन्न और निश्चिन्त हुई कि अपने आगे के सारे कार्यक्रम स्थगित कर सरकार के आश्वासन के पूरे होने की प्रतीक्षा करने लगी। आजतक प्रतीक्षारत है। इस बीच में इस जागृति-आंदोलन का एक लाभ अवश्य मिला कि नूतन परिसीमन में लोकसभा क्षेत्र का नाम अवश्य बदला और ‘पाटलिपुत्र लोक सभा क्षेत्र’ अस्तित्व में आया। एक नव-निर्मित रेलवे स्टेशन का नाम ‘पाटलिपुत्र’ हुआ।

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