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बशीर बद्र ने कहा था- “अब सबसे बड़ी ग़ज़ल हिन्दी में कही जाएगी”

निधन पर साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई शोक-सभा, इस वर्ष से दिया जाएगा स्मृति-सम्मान

RKTV NEWS/पटना(बिहार )30 मई। इस दौर के सबसे बड़े शायर थे डा बशीर बद्र । उनकी पंक्तियाँ ‘उक्तियाँ बन गयीं। जीवन के हर एक पहलू को उन्होंने अपनी शायरी से स्पर्श किया। अमीर खुसरो से शुरू हुई ऊर्दू शायरी की खूबसूरत कलियाँ चुनने वाले वे उम्दा और बेमिसाल शायर थे। वे हिन्दी के भी उतने ही हिमायती थे, जितनी की ऊर्दू के। अपने अंतिम साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- “अब सबसे बड़ी ग़ज़ल हिन्दी में लिखी जाएगी।”

यह बातें शनिवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, उनके निधन पर आयोजित शोक-सभा की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन-अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि इस वर्ष से सम्मेलन के महाधिवेशन में दिए जाने वाले सम्मान में डा बशीर बद्र का नाम भी जुड़ जाएगा। ऊर्दू और हिन्दी में उम्दा शायरी के लिए हर साल किसी एक शायर-कवि को ‘डा बशीर बद्र स्मृति-सम्मान’ दिया जाएगा।

दंगाइयों पर चोट करने वाले उनके इस शेर कि “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में” को उद्धृत करते हुए डा सुलभ ने कहा कि उनकी शायरी और अंदाज़े-बयां अलग ही था। ‘कोरोना-काल’ में उनके इस शेर की कि “वो हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से/ यह नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो” बहुत चर्चा हुई, जिसमें बदल रहे समाज की बेदिली देखी जा सकती है। डा बद्र इस शेर के साथ कि “गुज़रो जो बाग से तो दुआ करते चलो/ जिसमें लगे हों फूल, वह डाली हरी रहे” समाज के उन तत्त्वों को बचाए रखने पर बल देते हैं, जो समाज के लिए कल्याणकारी हैं। उनके इस शेर के साथ कि “उजाले अपनी यादों को मेरे पास रहने दो/ न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए” डा सुलभ ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

शोक व्यक्त करने वालों में वरिष्ठ साहित्यकार डा रत्नेश्वर सिंह, श्रीकांत व्यास, कुमार अनुपम, एम क्यू जौहर, ईं अशोक कुमार, डा कुन्दन लोहानी, प्रवीर कुमार पंकज आदि शामिल थे। सभा के अंत में दो पल के लिए मौन रख कर उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना की गयी। स्मरणीय है कि गत २८ मई को ९१ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

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