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भ्रष्ट्राचार के एक और खुर

भ्रष्ट्राचार के एक और खुर

सुत-सुता, सुतवन्ति कोई, नहीं मुझे तड़-माने पाया;
तुम भी मुझको क्या तड़‌पाओगी,
मेरी तो दत्तक कुर्सी पर पड़ी है छाया।

छोड़ रखा, क्षणभर उन वादों को, ठंडे बस्ते में डाल दिया;
बन कुटिया को अंगारू सा, रेखा लक्ष्मण है डाल दिया।

आस्था है, विश्वास भी है, इंतजार तू करना,
मजहब का मतलब अपने सा,
बतलाने तक, तू कभी न डरना।

दागों का अब गम नहीं; चाहे कितने भी गहरे हों;

खोल रखा हूँ अपनीदंराज, बस नोटों पर, गाँधी के चेहरे हों;
कभी पार किया था सीता ने रेखा को, आज का लक्ष्मण ही पार कर रहा रेखा को,
तरू-लता, अग्रज के विलाप के, बने थे गवाह,
आज माँगा जाता है, दे दो संख्या का गवाह।

ब्रह्मचारी का तप भंग नहीं हो पायेगा,
भले कन्याएँ डर से, दक्षिण, पूरव भग खडी हो;
परामर्शी का हवेली खुला है,
वहाँ एक सुन्दरी, नोटों पर पड़ी है।

शब्दों की गवाही को चिढ़ाया कहा, खेल था,
तनुजा बिन ब्याही खड़ी थी।

लड़े थे कुल वंश के लोग, वह खुद भी तो लड़ी थी;
बह्मचारी मूँदे आँख, कुर्सी तपलीन, इसीलिए सुंदरी तनुजा के लिए लड़ी थी।

जिनके हाथों हमने दिया मशाल था,
कारगिल की चोटी पर रखते,
काठ कुर्सी के पास रखा, चोटी पर अंधेरा था रखते।

था लहू जलाया हमने, घुस पैठी को मार भगाया,
हर्षद से पारीख तक, अर्थ पर डाल दिया प्रेतों की छाया।

आज वही फिर आखाड़े से बाहर होकर,
सड़कों पर है धूल उड़ाता, भले, लंगोटी खोकर।

शोर चोर का कहीं सुनाता, कहीं चोर मचाये शोर
देख रही है जनता, कौन खलनायक, कौन है चोर।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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