
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)19 मई।” यत्र तत्र”और “अनायास” के रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह की तीसरी रचना” यथावत” है जो जून 2003 में प्रकाशित हुई। अपनी रचना यथावत के संबंध में।
रचनाकार की ओर से…….
‘यत्र-तत्र’ और ‘अनायास’ के बाद यह ‘यथावत’ तीसरी रचना है।इसके अकुंर को सहेजने और समेटने में दो वर्ष तक प्रयासरत रहना पड़ा। हर घटी घटनाओं को बांधने की इच्छा होती गयी। विषयों की प्रस्तुति ने इतिहास का शक्ल लेना शुरू किया जिसे ज्यों का त्यों रख दिया अतः नाम ‘यथावत’।
कितने-कितने को जो झकझोरा,
मैंने जेहन में याद किया,
झोंके के कम्पन से न बुझे दीप,
कुछ ऐसा ही फरियाद किया।
भाषा साहित्य सम्मेलन और भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से जुटे रहने के कारण हिन्दी और भोजपुरी दो शाखाओ के रूप में एक साथ यथावत बढ़ते गया और उसमें भी एकांकी और कविता की टहनियाँ।
समाज का एक बेहतर स्वरूप होना चाहिए, जिसमें कोई किसी को दबाये नहीं कुचले नहीं। बड़े-छोटे का भेद पाटा जा सके। वैचारिक आर्थिक या सामाजिक स्तर पर अगर समरसता बनाया जाय तो राष्ट् सबल बन सकेगा। धार्मिक सहिष्णुता बनाये रखने की भी जरूरत है।
व्यक्ति से ऊँचा राष्ट्र है। उसको हर ऊँचाई तक ले जाना हर व्यक्ति का कर्तव्य बनता है। उसके लिए आतंकवाद, भष्ट्राचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद आदि समस्याओं से संधर्ष करने का मनोबल चाहिए। प्रस्तुत रचना शायद इन सबकी अवाज बन सके। अंतराष्ट्रीय स्तर पर दोहरे मानदंड अपनाने वालो को भी सचेत करना होगा।
यो भाषा टुटी-फुटी हो सकती है पर विचारो की तारतम्यता को बनाये रखने का प्रयास है।
मैं अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन और भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, भोजपुर शाखा का शुक्रगुजार हूँ, जिनका मंच मिला रहा। मैं अभार व्यक्त करना चाहूँगा डा० परशुराम सिहं जी का, श्री जितेन्द्र कुमार जी का और श्री रामायण सिंह जी का और कवि हीरा ठाकुर जी का जिन्होंने मेरी भाषा की गलतियों को सहेजने में मदद किया है। इसके बावजुद भी त्रुटियाँ हो सकना लाजिमी है।
पाठकगण सुधार करने का मौका देंगे।
आपका
डी० के० डी० सिंह
2 जून 2003
