
RKTV NEWS/समीक्षक -अश्विनी राय अरुण, बक्सर (बिहार)19 मई।राष्ट्र-चेतना, स्वदेशी संकल्प और आर्थिक संप्रभुता का जीवंत दस्तावेज।
प्रस्तावना
इतिहास के पन्नों में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो केवल गीत नहीं, बल्कि युग-परिवर्तन का उद्घोष बन जाते हैं। ‘वन्दे मातरम्’ ऐसा ही एक महामंत्र है। जनहित परिवार पत्रिका का वर्तमान ‘स्वदेशी अंक’ (२०२६-२७) उस समय प्रकाशित हुआ है जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आर्थिक धरातल पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल और भी गहरा होता जा रहा है। यह अंक केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आर्थिक स्वावलंबन की ‘त्रिवेणी’ है।
संपादकीय समीक्षा: निर्भीक स्वर और तीखी चेतावनी
संपादक श्री अतुल प्रकाश जी का संपादकीय इस अंक की आत्मा है। उन्होंने अपनी लेखनी से उन ऐतिहासिक भूलों और वर्तमान नीतिगत भटकावों को बेनकाब किया है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में दबा दिया जाता है।
अतुल जी बड़े साहस के साथ सवाल उठाते हैं कि १९४७ में सत्ता का हस्तांतरण तो हुआ, लेकिन ‘अंग्रेजियत’ का अंत नहीं हुआ। १९९९ की ‘फीलगुड’ राजनीति से लेकर २०१४ के बाद के ‘स्वदेशी नारों’ तक का जो विश्लेषण उन्होंने किया है, वह चौंकाने वाला है। वे स्पष्ट कहते हैं कि जिस ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ और विदेशी शक्तियों के सामने घुटने टेकने की नीति को अपनाया गया है, वह स्वदेशी के मूल भाव के साथ विश्वासघात है। यह संपादकीय चाटुकारिता से दूर, विशुद्ध राष्ट्रहित में लिखा गया एक कड़वा सच है।
खंड-एक (गद्य-खंड): वैचारिक अधिष्ठान
गद्य खंड में वन्दे मातरम् और स्वदेशी के अंतर्संबंधों को बहुत ही शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया गया है तथा साथ ही संवैधानिक और कानूनी पहलुओं को भी छुआ गया है:
अतुल प्रकाश जी का लेख ‘वन्दे मातरम् की १५० वर्षों की अमर गाथा’ इतिहास के उन गौरवशाली क्षणों को पुनर्जीवित करता है।
जगत नंदन सहाय जी ने ‘आनंद मठ’ का कथा सार प्रस्तुत कर पाठकों को उस मूल चेतना से जोड़ा है जहाँ से यह गीत उपजा।
अशोक श्रीवास्तव जी द्वारा बंकिम चंद्र चटर्जी का संक्षिप्त जीवन वृत्त नई पीढ़ी के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है।
डॉ. ममता मिश्रा और डॉ. राजीव नयन अग्रवाल के लेखों ने ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता के एक ‘शाश्वत प्रतीक’ (Eternal Symbol) के रूप में स्थापित किया है।
राणा प्रताप सिंह का विश्लेषण कि ‘स्वदेशी 2.0’ का लक्ष्य राजनीतिक नहीं बल्कि ‘आर्थिक सुरक्षा’ है, आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत को रेखांकित करता है।
प्रोफेसर (डॉ.) रणविजय कुमार ने महात्मा गांधी की स्वदेशी, स्वच्छता और सर्वोदय की अवधारणा को वर्तमान संदर्भों में जोड़कर एक नई दिशा दी है।
अगम पाण्डेय का आलेख ‘नारे से बाजार तक आत्मसम्मान की अधूरी कथा’ वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति पर एक गहरा कटाक्ष है।
राम प्रहलाद तिवारी ‘केहरी’ और प्रमोद कुमार सिंह के लेखों ने क्रमशः ऐतिहासिक संदर्भों और हिंदी साहित्य में स्वदेशी की जड़ों को बहुत ही तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है।
विधि और प्रोटोकॉल: गीत की गरिमा
पत्रिका ने केवल भावनाओं पर बात नहीं की,
गोपाल प्रसाद ‘साधु जी’ ने गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए प्रोटोकॉल की जानकारी दी है।
लक्ष्मी नारायण राय ने सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण दृष्टिकोण को साझा किया है जो ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्र की एकता और गौरव से जोड़ता है।
डॉ. रवि कुमार ने समकालीन समय में स्वदेशी आंदोलन की प्रासंगिकता पर सटीक शोध प्रस्तुत किया है।
यह खंड पाठक को बौद्धिक रूप से समृद्ध करता है।
पद्य-खंड: संवेदनाओं का समरघोष
पद्य खंड में प्रोफेसर (डॉ.) अरुण मोहन भारवी जी की उपस्थिति इसे साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करती है। लक्ष्मीकांत मुकुल, सुरेन्द्र सिंह ‘अंशु’ और कुमार अजय सिंह जैसे कवियों के साथ-साथ इस अंक में बाल कवि दीपांशी कसाना की कविता भविष्य की उम्मीद जगाती है।
इस अंक में आपके मित्र विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ अर्थात हमारी रचना “स्वदेशी का संकल्प: आत्मनिर्भर भारत और खादी के गौरव पर एक ओजस्वी कविता” समाज की विद्रूपताओं पर सीधा प्रहार करती है। कुछ पंक्तियाँ:
यही मंत्र है, यही तंत्र है, मुक्ति का उल्लास,अपनी माटी, अपनी मेहनत, अपना ही विश्वास।
यह कविता इस पत्रिका के ‘स्वदेशी’ और ‘चेतावनी’ भाव को पूरी तरह आत्मसात करती है। जहाँ एक ओर मशीनीकरण ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हाथ काट दिए हैं, वहीं दूसरी ओर ‘सत्याचार’ के हाथों से भ्रष्टाचार की जीत हो रही है। इस कविता में जिस ‘श्मशान की आबादी’ और ‘दरकती सभ्यता’ की बात की गई है, वह इस पत्रिका के चेतावनी खंड का ही काव्य रूप माना जा सकता है।
चेतावनी खंड: बाजारीकरण और षड्यंत्र का पर्दाफाश
यह खंड पत्रिका का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा है, जो व्यवस्था की नब्ज पर हाथ रखता है:
बाजारू योजनाएं:पत्रिका ने बहुत ही निडरता के साथ ‘एड्स के नाम पर कॉन्डम बेचने की बाजारू योजनाओं’ के पीछे के व्यवसायिक हितों को उजागर किया है।
कृषि पर संकट: ‘खेती-बाड़ी पर कब्जा करने के कुचक्र’ पर जो चर्चा की गई है, वह बताती है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे भोजन की थाली पर नियंत्रण करना चाहती हैं। यह खंड ‘विदेशी उतरन’ के प्रति हमारी मानसिक गुलामी को आईना दिखाता है।
निष्कर्ष:’वन्दे मातरम् – स्वदेशी अंक’
अपनी पठनीयता और प्रखरता में अद्वितीय है। जगत्नंदन सहाय, रणविजय कुमार और अतुल प्रकाश की टीम ने एक ऐसा अंक तैयार किया है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए संदर्भ ग्रंथ का कार्य करेगा। यदि आप भारत को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक जीवंत राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो यह अंक आपके संग्रह में अनिवार्य होना चाहिए।
