
सती प्रथा!
कोई रूपकँअर दिवराला में, माल सिंह पर आज जली; रूप यौवन खिलने के पहले, झुलस गयी है एक कली।
सती हुई क्या कोई पहले, यह इतिहास नयी है; पति को गोद लिए जल जाये, यह तो आज नयी है।
हिमांचल के हवन कुंड में, क्या सती, पति पर कभी जली थी; या चित्तौड़ गढ़ की ललनाएँ, पति की चिता पर कभी चढ़ी थी।
सह न सकी अपमान पिया की, हवन कुंड में एक जली थी; प्राण गँवाकर रखी लाज एक, मातृभूमि के लिए मरी थी।
सब वीर चित्तौड़ के चले गये, इनका न कोई रखवाला था; नंगी तलवारें पहरा देगी अस्थि शेष को, क्या इसलिए दिवराला था।
दुहरायें न दिवराला, ऐसा ही कुछ करना है; पति का प्रेम संजोये जो भी, उस विधवा को सकुशल रखना है।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की उन्नसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)


