दहेज का फल !
द्रौपदी को चाहने की लालसा तो है सब में पर, तेल चित्र मछली जो नाचे, आँखों में बाण मार सकते नहीं।
हस्तीनापुर का राज तो सभी चाहते हैं पर, लक्षागृह की सुरंग का भेद कोई जान सकते नहीं।
स्वयंवर में पुत्र की जगह पिता जबतक भँजाते रहेंगे; और लालच के वाणों से दहेज को चुभाते रहेंगे।
द्रौपदी के बदले कोई नर्त्तकी ही पायेंगे, रनिवास तक साथ ही रहेगी, वनवास में न पायेंगे।
एकलौती बेटी का बाप जहाँ कहीं मिलता है, बेटा उसी को झट हस्तिनापुर ही समझता है।
विद्या को छोड़ पढ़ाई का लक्ष्य बस दहेज ही समझता है, गुणा क्या, बस रुप लावण्य और दहेज तक समझता है।
एक फल के पाँच हिस्से, जब पाँचों में बटता है; लक्षा-गृह तक, तब सहदेव साथ ही में रहता है।
दहेज का धन लिए, आज की द्रौपदी जब आती है; शादी के साथ ही सहदेव की छुट्टी मिल जाती है।
पिता की दहेजी बाणें को तरकस में समेटना होगा; थोड़ा भी मिले तो भाइयों में बाँट कर खाना होगा।
नर्त्तकी रनिवास से उठकर, बनवास की द्रौपदी बन जायेगी: युधिष्ठिकर से सहदेव तक साथ रहेंगे, तो हर जगह हस्तिनापुर बन जायेगी।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की अठारहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)



