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सारण:टीबी मुक्त पंचायत की परिकल्पना को साकार करने में सार्थक सिद्ध होगा एआई आधारित अल्ट्रा पोर्टेबल मशीन।

100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत हाई-रिस्क गांवों में होगी स्क्रिनिंग।

एआई तकनीक से लैस अल्ट्रा पोर्टेबल एक्सरे मशीन का होगा इस्तेमाल।

सारण जिले के 437 गांव है हाई-रिस्क।

RKTV NEWS/छपरा(सारण )30 मार्च।सारण जिले के सुदूर गांवों में अब स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर तेजी से बदल रही है। कभी टीबी जैसी गंभीर बीमारी की पहचान और इलाज के लिए मरीजों को शहरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, लेकिन अब आधुनिक तकनीक ने इस दूरी को खत्म कर दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित अल्ट्रा पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों के जरिए गांव-गांव में ही टीबी की जांच हो रही है। “टीबी मुक्त पंचायत” के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुरू किया गया 100 दिवसीय विशेष अभियान न केवल मरीजों की समय पर पहचान कर रहा है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली में भरोसे की नई नींव भी रख रहा है।

437 गांवों को हाई-रिस्क श्रेणी में चिन्हित

24 मार्च से शुरू हुए इस अभियान के तहत जिले के 437 गांवों को हाई-रिस्क श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इन गांवों में विशेष कैंप लगाकर टीबी की सघन स्क्रीनिंग की जा रही है। मेडिकल टीमों में शामिल डॉक्टर, लैब टेक्नीशियन और आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों से संवाद कर रहे हैं, उन्हें टीबी के लक्षणों के प्रति जागरूक कर रहे हैं और जांच के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जिसकी समय पर पहचान न होने पर यह तेजी से फैल सकती है।

एआई तकनीक से लैस अल्ट्रा पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की सबसे बड़ी खासियत

इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत है एआई तकनीक से लैस अल्ट्रा पोर्टेबल एक्स-रे मशीन। जिले में फिलहाल ऐसी दो मशीनें उपलब्ध हैं, जो स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे रही हैं। ये मशीनें इतनी हल्की और सुविधाजनक हैं कि इन्हें आसानी से एक गांव से दूसरे गांव तक ले जाया जा सकता है। बैटरी से चलने वाली यह मशीन बिजली की कमी वाले इलाकों में भी बिना किसी बाधा के काम करती है।
जांच की प्रक्रिया भी बेहद सरल और तेज है। मरीज को मशीन के सामने खड़ा किया जाता है और कुछ ही सेकंड में उसके फेफड़ों का एक्स-रे लिया जाता है। इसके बाद एआई तकनीक तुरंत उस एक्स-रे का विश्लेषण कर संभावित संक्रमण की पहचान कर लेती है। फेफड़ों में मौजूद सफेद धब्बों या अन्य असामान्य संकेतों के आधार पर यह तकनीक यह बता देती है कि मरीज में टीबी की आशंका है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया में रेडियोलॉजिस्ट की तत्काल आवश्यकता नहीं होती, जिससे समय की बचत होती है और ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच संभव हो पाती है।
अभियान के दौरान विशेष रूप से उन लोगों पर ध्यान दिया जा रहा है, जो टीबी के ज्यादा जोखिम में हैं। इनमें 80 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग, पहले टीबी से पीड़ित रह चुके मरीज, कुपोषित व्यक्ति और मधुमेह के मरीज शामिल हैं। इन वर्गों की प्राथमिकता के आधार पर स्क्रीनिंग की जा रही है, ताकि गंभीर मामलों को समय रहते चिन्हित कर इलाज शुरू किया जा सके।

टीबी मुक्त पंचायत के लिए छह मानक तय

सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी के अनुसार टीबी मुक्त पंचायत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए छह प्रमुख मानकों पर काम किया जा रहा है। इनमें सक्रिय मरीज खोज (Active Case Finding) सबसे अहम है, जिसके तहत हर पंचायत में संभावित मरीजों की पहचान की जा रही है। इसके अलावा, उपचार की सफलता दर 90 प्रतिशत से अधिक बनाए रखने, सभी मरीजों की यूडीएसटी जांच सुनिश्चित करने, 100 प्रतिशत मरीजों को पोषण सहायता उपलब्ध कराने और दवा-प्रतिरोधी टीबी की जांच को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। अंततः ग्राम सभा द्वारा पंचायत को टीबी मुक्त घोषित करने का प्रमाण पत्र इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम चरण होगा।

आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की भूमिका भी अहम

गांव स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की भूमिका भी अहम हो गई है। यहां अब टीबी मरीजों को नियमित रूप से मुफ्त दवा उपलब्ध कराई जा रही है। साथ ही, सैंपल कलेक्शन की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे मरीजों को जांच के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। इस व्यवस्था ने ग्रामीणों के लिए इलाज को आसान और सुलभ बना दिया है।
अभियान की सफलता में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। ये कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को जागरूक कर रही हैं, लक्षणों के बारे में जानकारी दे रही हैं और जांच के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि अब लोग पहले की तुलना में ज्यादा संख्या में जांच कराने के लिए आगे आ रहे हैं।

जमीनी हकीकत भी बदल रही है

रिविलगंज प्रखंड के एक गांव में लगे कैंप में पहुंचे 65 वर्षीय रामजी महतो बताते हैं पहले खांसी को हम सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते थे। लेकिन जब गांव में ही जांच की सुविधा मिली, तो हमने जांच कराई। अब समय पर इलाज शुरू हो गया है, जिससे राहत मिल रही है।

मुखिया का नजरिया

मकेर प्रखंड के कैतुका नंदन पंचायत के मुखिया मिथिलेश कुमार राय कहते हैं, सरकार की यह पहल गांव के लिए वरदान साबित हो रही है। पहले लोग टीबी को छिपाते थे, लेकिन अब जांच आसान हो गई है और लोग खुलकर सामने आ रहे हैं। हमें उम्मीद है कि जल्द ही हमारा पंचायत टीबी मुक्त होगा।

आशा कार्यकर्ता की मेहनत

आशा कार्यकर्ता मधु देवी बताती हैं कि हम रोज गांव में घूम-घूमकर लोगों को समझाते हैं। अब एआई मशीन से तुरंत रिपोर्ट मिल जाती है, जिससे लोगों का भरोसा बढ़ा है। पहले जांच में समय लगता था, अब सब कुछ जल्दी हो रहा है।
हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कई ग्रामीण इलाकों में अभी भी जागरूकता की कमी है और लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। इसके अलावा, कुछ मामलों में सामाजिक संकोच भी सामने आता है, जहां लोग बीमारी को छिपाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में जागरूकता अभियान को और मजबूत करने की जरूरत है। फिर भी, जिस तरह से तकनीक और स्वास्थ्य सेवाओं का मेल सारण में देखने को मिल रहा है, वह उम्मीद जगाता है। एआई आधारित पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों ने न केवल जांच की प्रक्रिया को आसान बनाया है, बल्कि यह साबित कर दिया है कि अगर सही रणनीति और संसाधनों का उपयोग किया जाए, तो किसी भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती से निपटा जा सकता है।

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