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उम्मीदवार के मुँह से !

फोटो सौ: सोशल मीडिया

उम्मीदवार के मुँह से !

आते देखा एक बालक को, व्योम से पर नहीं हाथ था अब मम्मी का;

राजतिलक माथें पर उसके, जबकी घर में लाश रखी थी मम्मी का।

बोला अबकी बार तू साथ में आ जा, छोड़ दिया बैलों की जोड़ी;

गैया छोड़ा, बछड़ा छोड़ा, तेरे खातिर सब कुछ छोड़ा।

चाल है जैसे देहरादून का, हाथ हिलाकर, टाटा करके मुझे बुलाता; अनुभव है संपूर्ण गगन का,

सजनी साथ रहो, कह मुझे बुलाता ।

कहता, खून का एक-एक कतरा क्या है, हर खून में एक मम्मी है; इंदिरा न केवल मम्मी उसकी, वह जन-जन की तो मम्मी है।

टुअर अपने बेटे कौ झोली में, भीख मतो का अबकी दे दो;

एक रहें, अखंड रहे यह देश, द्वार पर जाकर कहता अबकी दे दो।

लो मुकुट वीर बालक यह ले लो, लो खड़ग-दाल अबकी तू ले लो; बोला सात दिनों का काम, पाँच में कराऊँगा, देश को जल्दी, शताब्दी पार कराऊँगा।

इक्कसवीं सदी का सपना यदि सजाना, आतंकवाद से हरदम भिड़ते जाना; लिट्टे के परचम से तो, होशियार बने तू रहना, इंदिरा आवास, जवाहर रोजगार, इसे बराबर जपना ।

मानचित्र पर की रेखा को, कभी न मोटी कहना, परखे बीना न माला लेना, पंखुड़िया गिन-गिन लेना; बीन पहचाने नहीं कभी भी, साथ किसी को रखना, नहीं तो डॅस देंगे ये नाग विषैले, इन्हें बस दूर भगाये रखना।

हम तूम पर जान भी दे देंगे, तेरे खातीर अपनी जान भी दे देंगे; तेरे ही बस हाथ पर, किस्मत की रेखा खींच रख देंगे।

पर हमें बिलखते छोड़ बीच, अनकहे जगह तू गये कहाँ, अब किस संबल से रहना होगा, कौन बताये हाय यहाँ।

शस्त्रों के रखवाले को देखो, बोफार्स का पेट फाड़ निकले आता; चुसे न जोंक और अर्थ को, उस पर नमक डालते है आता ।

टोपी पहने फर का, कहता, देखा नया तो मैं हूँ अबकी; सैर सपाटे तुम्हें चढ़ाकर, करवाऊँगा चक्र पर अबकी।

ताउ ने सोचा, चलकर, काँटें राहों का, साफ किये देता हूँ, थाली में सरसों की साग, और रोटी गेहूँ का देता हूँ।

खेतों की आर पर ताउ जब, पगड़ी बाँध चले निकले; मंडल धारा फूटी फर की टोपी से, खेत क्या महल उसी में बह निकले।

यह वेग न रूकने वाली है, कोई जला क्यों, ये तो शीतल करने वाली है;

पीयों दलित और पीयों पथिक, यह तो तृप्ति देने वाली है।

नहीं रहोगे अब पीछड़े, यह विपन्नता भगाने वाली है;

बाइस तक ही क्यों, अभी और सत्ताइस आने वाली है।

सोये सम्पन घरों में, लगा भूचाल कहाँ से आया;

खून चुसे होठों को, लगा ये विष कहाँ से आया।

लगे बोलने, रथारूढ़ हो जाओ, छोड़ों महलों को, मंदिर में आ जाओ; मंत्रोचार कर आंजूल जल फेको; कहो कमंडल जान बचाओ ।

मंडल और कमंडल के बाणों बीच, घमासान से घोर गर्जना छायी;

लगा की सिंहासन हिल उठा, अचानक नंभ पर बादली छायी।

राजर्षी भी क्यों घबड़ाये, विश्वमित्र सा चले पुनः को तप पर; एक संसार नया ही रच दूँगा, तब तो अवधेश भी, आवेंगे सिखने मेरे घर पर।

सुनो, सुनो हे लोग देश के, ये राजा नहीं फकीर है; अलख जगाने निकल पड़ा है, ये भारत की तकदीर है।

क्यों सोये हो अब तो जागो, न्याय द्वार पर आन खड़ा है; अर्द्ध शतक तक तेरा बन्धों, मंडल आन खड़ा है।

जय तेरे टोपी की राजा, जिससे मंडल की धारा निकली है; बन गये मसीहा पिछड़ो-दलितों के, एक ज्योति फुट चली है।

एक लिये फूल हमें दिखाता, गजरा तुम्हें पहनाऊँगा; साथ लिये मंदिर जाऊँगा, साथ लिए घर आऊँगा।

शिला और जनेऊ तथा खड़ाऊ संबल देना; झंझावात, तुफानों में भी ये फूल खिलाये रखना । रथ निकल पड़ा हैआजरौदनेजो आगे बढ़ आयेगा; कोई माई का लाल नहीं, जो इसे रोक भी पायेगा।

सरयू, गंगा, राप्ती, नर्मदा, गोदावरी के, बस हर तट को आज रगेंगे; तट पर आज केसरिया छायेगा; जल बीच कमल खिलेंगे।

भजते जाओ दीप जलाकर, जै श्री राम, जै श्री राम; धुन मुरली के, अटल, कृष्णा का जै श्री राम, जै श्री राम।

जलज से जलज को साफ करेंगे, आगे-आगे कल्याण करेंगे; रहे कमल-सा मुखड़ा खिला तुम्हारा, वही कल्याण करेंगे।

आधुनिक सभ्यता नहीं, मुझे तो संस्कृति समझ में आता है; मुझे तो अयोध्या के पंचकोशी में केवल गर्भ गृह नजर आता है।

हसुआ बाली वाला कहता, गेहूँ तुम्हें खिलाऊँगा; चादर लाल बिछा सेज पर, साथ तेरे सो जाऊँगा।

यह चादर है रंगा खून से, मजदूर शिकागो जैसों का; तेरा मेरा रिश्ता खून का, नहीं अधिक बल श्रम से, है पैसों का।

हर खेत-खलिहानों को, खान-खनन कारखानों को; लाल रंग की छतरी देंगे, रेल, बैंक, डाकखानों को।

जो भी तेरा-मेरा हक निगलेगा, मार हथौड़ा जबड़ा तोड़ेंगे; अंगारों के बीच में रहकर, लोहे को भी मोम बना रखेंगे।

अपनी ही गरमी से पिघलायेंगे, फिर हमशकल सभी को बनवायेंगे; हुगली, कृष्णा, कावेरी के जल को, बस लाल-लाल करवायेंगे।

हावड़ा, तिरुअनंतपुरम् अगरतल्ला क्या, पटना होते दिल्ली तक बढ़ते जायेंगे; सिंहासन खाली करो की जनता आती है, गरजते हुए दिल्ली तक को जायेंगे।

एक हथौड़ा लिए खड़ा कह रहा, हसुँए का धार पिजाऊँगा; दिन में अगर बना नहीं तो, रातों में तारे तुम्हें गिनाऊँगा।

इस चादर लाल पर तारा चमका, और ऊपर ही उठते जाता है, चारू दादा, कालू दादा के इनकलाब को, अब तो आगे-आगे ही बढ़ते जाता है।

हम अपनी माथें की पसीने से, तपती धरती को सिंचेंगे; और उसके गोदी के अमृत को, बाँट-बाँट कर पी लेंगें।

चरखा वाला खड़ा निहारे, कर बौना के रूप; आँख जातकर मुझे बुलावे, मैं तेरे अनुरूप।

पेप्सीकोला नहीं चलेगी, स्वदेशी अपनायेंगे; नीलहों के ही बीच नहीं, बिड़ला मंदिर तक रघुपति राघव गायेंगे ।

सिर मेरा झुकेगा उनके चरणों पर, आन देश के खातीर चढ़ गये बली पर; नहीं अछूत कोई होगा अब, वैमनस्य ही दूर, वैभव छायेगा घर-घर।

एक नया वो हाथी वाला, झुम-झुम कर बोले; कभी नहीं मैं तुम्हें ठगुँगा उन जैसे, बोले हौले हौले ।

बहुजन के ऊपर अब लघुजन का, राज नहीं हम चलने देंगे;

गंगा क्या, झेलम-सतलज क्या ब्रह्मपुत्र से यमुना तक अपनायेंगे।

सुनो पचासी वालो अब तो, कभी न पंद्रह से घबड़ाना;

मनु का पोथी कभी न पढ़ना, बाबा साहेब को अपनाना।

सीढ़ी लेकर है एक बोलता, मेरे पास तू आओ ना, ऊपर तुम्हें चढ़ाऊँगा, तू सबको दूर भगाओ ना।

गोदावरी के गोद में आ जा, सोन-गंडक तीर घुमाऊँगा; ठठरी पर की गठरी से ही, नित दिन तुम्हें खिलाऊँगा ।

खेत भी दूँगा, जोत भी दूँगा, चिमनी तक का धुआँ भी दूंगा; हमले का हथियार भी दूँगा, एक दिन दिल्ली का दरबार भी दूँगा

खेतों की हरियाली से तेरे, होठों पर लाली भर दूँगा; हर चुल्हे की धुँआ को दो जुन, छप्पर से दिखता कर दूँगा।

एक हलवाहा चक्र बीच से, बोले, साथ रहो तू प्यारी; हरा-भरा मन अपना होगा; जग होगा बस न्यारी-न्यारी ।

वर्षों में कोई करे काम जो, मुझे महीनों में ही करने आता है।

गुणा को भाग बनाने आता, चालिस को चार बनाने आता है।

मैं उबलते हुए खून को सहला कर ठंढ़ा बनाना जानता हूँ; मंदिर या मस्जिद होगा रहा, बस सर्वे कराना जानता हूँ।

एक साइकिल लेकर है सरपट दौड़ता, बोलता, पिछले सिट पर बैठो प्यारी; गंगा से यमुना तक होगा मेरा, यदि साथ रहो तू अबकी बारी।

कन्दरा और बिहड़ों की रानी, अब तुमको हैं क्या घबड़ाना; सिकचों से बाहर आओ तू, मिलकर है अब दिल्ली को हथियाना ।

इम्तहान से छुट मैं दूँगा, तीसरा से अव्वल कर दूंगा; सड़क दूँगा, बिजली दूँगा, पीने का पानी मैं दूँगा, घर के पास बाजार भी दूँगा।

हम आये हैं साथ में चौदह, लेकर साथ मसाल; अंधेरा अब नहीं रहेगा, न रहेगा कोई फटेहाल ।

घोर विषमता जो छायी है, उसको हमी मिटायेंगे; डायनामिक शक्ति से ही, हम समता को फैलायेंगे।

बोल रहा है मुर्गा अब तो, फिर भी तू क्यों सोयी हो; आने को है, सुबह-सबेरा, अब भी तू क्यों सोयी हो।

जागो, तीर-धनुष का टंकार सुनकर जागो; जंगल ही में मंगल होगा, बस एक बार तू जागो ।

कितना स्पन्दन है मुझमें, मैं एक डाल की दो पत्ती हूँ; क्रन्दन तेरा कौन सुनेगा दूसरा, यद्यपि कोने में मैं सिमटी हूँ।

सागर की लोल लहर दिखला देंगे, तेरी सिपी में मोती को तो भर देंगे; रखकर रूप मैं चित्रपटों में, तुमको हर दिन, दिल में ही बैठा रखेंगे।

रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की पंद्रहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

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