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महाकवि सूरदास की जयंती पर विशेष।

RKTV NEWS/अनिल सिंह,25 अप्रैल।सूरदास 16वीं शताब्दी के एक अंधे हिंदू भक्ति कवि और गायक थे, जो सर्वोच्च भगवान कृष्ण की प्रशंसा में लिखे गए अपने कार्यों के लिए जाने जाते थे। वह भगवान कृष्ण के वैष्णव भक्त थे, और वे एक श्रद्धेय कवि और गायक भी थे। इनका वास्तविक नाम सूरध्वज था और इनको सूरदास की उपाधि इनके गुरु वल्लभाचार्य ने दी थी। महाकवि श्री सूरदास का जन्म 1478 ई में रुनकता क्षेत्र में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूरदास का जन्म दिल्ली के पास सीही नामक स्थान पर एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह बहुत विद्वान थे, उनकी लोग आज भी चर्चा करते हैं। आज इनकी जयंती पर रचनाकर अरुण दिव्यांश ने अपने शब्द भावों से इनका गुणगान व स्मरण किया।

कहने को तो तुम सूर हुए ,
किंतु थे तुम पहले सूर कहां ।
किंतु दिखने में तुम सूर थे ,
तुम सम कहीं कोई नूर कहां ।।
पहले थे तुम तो सूर कहां ,
बुराईयों से डर तुम सूर हुए ।
तन मन किए निर्भय निश्छल ,
मानव होकर भी तुम सुर हुए ।।
ठान लिया दिव्य दर्शन को तुम ,
तप में भी तो तुम शूर हुए ।
झुकना पड़ा राधेकृष्ण को भी ,
तेरी भक्ति से इतना मजबूर हुए ।।
कायल हुए राधेकृष्ण का तुम भी ,
शृंगार रस के तुम आधार बने ।
सूर श्याम दोनों ही हुए मित्रवत ,
बाल लीला के भी कर्णधार बने ।।
भक्ति सूझ गई श्याम को तेरी ,
दर्शन देने को वे मजबूर हुए ।
आ गए समीप‌ इतने ही तेरे ,
नहीं कभी तुमसे वे तो दूर हुए ।।
सदा नमन मेरा कोटि तुम्हें ,
सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
कृपा बरसाओ मुझ पर भी तुम ,
तेरी कृपा को सदा मैं तड़ता हूं….. अरुण दिव्यांश

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