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मृत्यु के पश्चात् पाँच वस्तुएं साथ जाती है : डा जंग बहादुर पाण्डेय

डॉ जंग बहादुर पांडे

आरा/भोजपुर 23 जुलाई।इस मृत्युलोक में सीमित समय के लिए राजा रंक फकीर सभी आते हैं और जाते भी हैं।मरणोपरांत कोई भी सांसारिक वस्तु साथ नहीं जाती – न भवन, न वंश, न पद, न अधिकार। इस शेष जीवन को सदा स्मरणीय बनाने के लिए विद्वान वक्ता डा जंग बहादुर पांडेय से वरिष्ठ पत्रकार डा दिनेश प्रसाद सिन्हा ने बातचीत की।डा पांडेय ने बताया की मृत्यु कोई अंत नहीं, अपितु आत्मा की यात्रा का एक पड़ाव है।जब देह यहीं रह जाती है, तब भी कुछ वस्तुएँ हैं जो आत्मा के साथ परलोक की ओर गमन करती हैं जिनमें 1. *कामना* – मृत्यु के क्षण में यदि मन में कोई अपूर्ण इच्छा,वस्तु विशेष की आसक्ति याअधूरा संकल्प शेष रह जाता है, तो वह कामना जीवात्मा के साथ ही परलोक में प्रवेश करती है। यही कामनाशेषता जन्मों के चक्र का कारण बनती है और आत्मा पुनर्जन्म के चक्र में घूमती रहती है। 2. *वासना -* वासना का अर्थ केवल शारीरिक विषयों तक सीमित नहीं बल्कि भोगे गए सुखानुभवों की तीव्र स्मृति है —चाहे वह धन, वैभव, मान, या भोग क्यों न हो। इन सुखानुभूतियों की गंध आत्मा के साथ रहती है, और यह वासना ही उसे पुनः संसार में खींच लाती है। 3 *कर्म -* मनुष्य के सुकर्म व कुकर्म, उसके दैनंदिन व्यवहार और नियत — सब मृत्यु के बाद आत्मा के साथ रहते हैं।यही कर्म संस्कार अगली देह,अगला जन्म और अगला जीवन तय करते हैं।यही प्रारब्ध की नींव है। 4 *ऋण* -यदि जीवन में किसी से कोई ऋण धन का, भावनाओं का, श्रम या कृतज्ञता का और उसे चुका नहीं पाए, तो वह ऋण केवल आर्थिक नहीं, धार्मिक और आध्यात्मिक दायित्व बन जाता है।मृत्यु के पश्चात् यह ऋणबन्धन आत्मा को बाँधता है और पुनः उस व्यक्ति या संबंध की ओर खींचता है,जिससे यह ऋण जुड़ा हो। 5 *पुण्य* -पुण्य ही वास्तविक साथ चलने वाली संपत्ति है। यह ही लोक में सम्मान और परलोक में गति प्रदान करता है।दान, यज्ञ, सेवा, धर्माचार, और परहित के कार्य ही पुण्य के बीज हैं। पुण्य आत्मा के तेज को पुष्ट करता है और उच्च गति देता है।
इसलिए जीवन को ऐसा जियें कि अंत समय में कोई इच्छा शेष न रहे, कोई ऋण बाँकी न हो और केवल पुण्य, शुद्ध कर्म और शांत अंतःकरण ही शेष रह जाए।जीते जी कामनों की पूर्ति मोक्ष है और अपूर्ति मृत्यु है। वाल्मीकि रामायण में रावण की मृत्यु के पश्चात् भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि रावण मारा गया,मेरे विरोध का अंत हो गया , क्यों कि मृत्यु ही विरोध की परिसमाप्ति है।अतः हे लक्ष्मण!अपने भाई की तरह इसका उचित संस्कार करो-
मरणान्तानि वैराणि, निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियताम् अस्य संस्कारो, मया अपि यथा तव।
अर्थात शान्ति, क्षमा, और पुण्य ही अंतिम क्षण के सच्चे साथी हैं।

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