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मुहर्रम पर विशेष:” मुहर्रम हराम है “

समस्तीपुर/बिहार (डॉ परमानन्द लाभ)06 जुलाई। “मुहर्रम “। “मुहर्रम ” का शाब्दिक अर्थ होता है- “निषिद्ध “। निषिद्ध यानी, जो वर्जित हो, प्रतिबंधित हो, खराब काम हो, अकरणीय हो, हराम हो, पाप हो आदि।
पाप के विरुद्ध फायदा शब्द का इस्तेमाल करके मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ कुरान की आयत 2:219 स्पष्ट एलान करती है कि हराम वह है जो हानिकारक है और फायदा पहुंचाता है,जो उसके विरुद्ध है। कहने का मतलब यह है कि पाप उसे कहते हैं जो दूसरे को अथवा खुद को नुकसान पहुंचाता हो।
इस्लामिक कलेंडर के मुताबिक मुहर्रम को चार पवित्र महीने में एक माना जाता है। मुहर्रम का दसवां दिन, जिसे “अशूरा ” कहा जाता है, का इस्लाम में, विशेषकर शिया में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, जिसे सब्र (धैर्य), कुर्बानी (त्याग) और असलियत (सच्चाई) का प्रतीक माना जाता है।
मुहर्रम के दौरान शिया पैगंबर मुहम्मद के पोते अथवा नाती इमाम हुसैन व उनकी शहादत को याद कर शोक मनाते हैं, वहीं सुन्नी इस आशुरा के दिन को पैगंबर मूसा के प्रति सम्मान का दिन मानते हैं। इसप्रकार इस्लाम में यह स्मरणोत्सव गम और खुशी मनाने एक महत्वपूर्ण अवसर है।
इससे जाहिर होता है कि मुहर्रम इमाम हुसैन की शहादत की याद दिलाता है ,जो कर्बला की लड़ाई में शहीद हो गए थे।
सवाल उठता है कि इमाम हुसैन क्यों शहीद हुए थे? शिया का मानना है कि पैगंबर मुहम्मद के दामाद औ चचेरे भाई हजरत अली को उनका वैध अधिकारी होना चाहिए। और सुन्नी समुदाय के लोग क्या-कुछ कहते हैं?उनका मानना है कि पैगंबर मुहम्मद के पहले तीन करीबी दोस्त- अब्बू बकर, उमर और उस्मान भी उनके वैध उत्तराधिकारी थे। लड़ाई का असली मकसद खलिफागिरी क्या था? खलिफागिरि।
शिया और सुन्नी की इन मान्यताओं की परिणति क्या हुई? कुरान गौण पड़ गया, मुहर्रम का मकसद बदल गया और परिणाम कर्बला की त्रासदी के रुप में सामने आया।

डॉ परमानन्द लाभ

मुहर्रम का पवित्र महिना शोर करके कहता है कि इसमें लड़ाई – झगड़ा करना, युद्ध करना गैरवाजिब है, निषिद्ध है, पाप है, हराम है, वर्जित और प्रतिबंधित है। यह महिना तो खुदा की इबादत का है, प्रार्थना और चिंतन के लिए है, रोजा और जकात के लिए है। फिर हमारे मुसलमान भाई आज करते क्या हैं? झूठ, फरेब व असलियत के विरुद्ध लड़ने की जगह झूठी लड़ाई का खेल खेलते हैं। परस्पर मोहब्बत का पैगाम जारी करने की जगह साम्प्रदायिकता की जहर उगलते हैं । हुसैन के कब्र के प्रतीक ताजिया अथवा दाहा तो निकालते हैं, लेकिन सामाजिक व राष्ट्रीय सौहार्द के प्रति समर्पित नहीं दिखते। काश! झरनी के स्थान पर प्रेम गीत गाते।
इसप्रकार यह कथन सर्वथा समीचीन दिखता है कि – ” मुहर्रम हराम है। “

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