
RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय,06 जुलाई।वादा रहा। अगले महाकुंभ में जरूर जाएंगे। खूब नहाएंगे। जमकर डुबकी लगाएंगे। महज 144 साल की ही तो बात है। उनमें से भी तीन-चार महीने तो बीत ही चुके हैं। समय बीतते देर नहीं लगती। कर लेंगे इंतजार। इंतजार का अच्छा अनुभव हो गया है। जब नया-नया था, इंतजार से डर लगता था। अब नहीं लगता। मजा आता है। अनुभवी होने का यही तो फायदा है। डर मजे में बदल जाता है।
महाकुंभ नहाकर लौटे एक मित्र से चर्चा की तो हंसने लगे। पूछ बैठे – 144 साल जिंदा रहिएगा क्या? मैंने कहा, अब तो जिंदा रहने की पक्की गारंटी है। मोक्ष वाली लिस्ट में मेरा नाम ही नहीं गया है। बैकुंठ जाने का सवाल ही नहीं। रहना तो हमें मर्त्यलोक में ही है। हो सकता है कि चोला बदल जाए। 84 लाख योनियां हैं। इन्हीं में से कोई न कोई अलाट होगी। कौआ, कुत्ता, गदहा, केंचुआ… जैसे अपने कर्म हैं, उनसे उम्मीद तो कुछ ऐसी ही बनती है। कोई भी चोला मिले, चलेगा।
मुझे तो ये इंसान वाला चोला सबसे बकवास लगता है। ये मानव चोला ड्रामा का पुतला है। अंदर कुछ। बाहर कुछ। सामने कुछ। पीछे कुछ। कौआ, कुत्ता, गदहा… या और कोई चोलेवाला मुंह लटकाए नहीं दिखता। न ही समस्याएं गिनाता, नारे लगाता, धरना-प्रदर्शन करता। सबसे ज्यादा ज्ञान, बुद्धि, विवेक मानव चोलाधारी के पास ही है। और सबसे ज्यादा टेंशन भी इसी के पास है। भांति-भांति के टेंशन। टेंशन से मुक्ति कैसे मिले, इसकी अलग टेंशन है।… पर चोला तो चोला ही है। नश्वर है। पर मैं चोला नहीं हूं। चोले में हूं। मैं तो शाश्वत हूं। अजर, अमर, अविनाशी। आत्मा हूं मैं। परमात्मा का अंश।
मालिक तो ऊपर बैठा है। तय तो वही करता है। जिसको बुलाना होता है, उसे बुलाता है। जिसे नहीं बुलाना होता है, उसे यहीं छोड़ देता है। मुझे नहीं बुलाया। तो मैं भी नहीं गया। कसम से! एक सेंटीमीटर भी दुबला नहीं हुआ हूं। रत्ती भर टेंशन नहीं। मजे में हूं। इंतजार के मजा ले रहा हूं। स्वर्ग लोक के द्वार फिलहाल मेरे लिए बंद हो गए। कल्पना लोक के दरवाजे खुल गए हैं।
अहा! सन 2169 का महाकुंभ! नया इतिहास रचने की तैयारी में है। सब कुछ नया-नया। बदला-बदला। समय बदला। दुनिया बदली। इकोनामी बदली। टेक्नोलॉजी बदली। नया मीडिया नवीनतम तेवर के साथ महाकुंभ का बखान कर रहा है।
क्या भव्य नजारा है! गंगा मइया में गंगोत्री से भी निर्मल जल प्रवाहित है। यमुना जी भी निर्मलता की सीमाएं तोड़ रही हैं। कचरा के दर्शन को नैन तरस गए हैं। डुबकी लगाने में कोई धक्का-मुक्की नहीं। हर श्रद्धालु के पास खुद की पवित्र डुबकी मशीन है। बस एक बटन दबाया और गंगाजल की सेंसर-नियंत्रित फुहार ने अंदर से बाहर तक सब शुद्ध कर दिया। नो धक्का-मुक्की। नो चिल्लम-चिल्ली। ‘हर-हर गंगे’ की जगह ‘हैशटैग-गंगा-2169’ ट्रेंड कर रहा है। सबसे बड़ी बात, मात्र 66 करोड़ नहीं, 66 हजार करोड़ लोगों के साथ डुबकी लगाने का मौका मिला है। खास बात यह कि मनुष्य सिर्फ पृथ्वी के भरोसे नहीं रहा। कई ग्रहों पर अपने पुण्य और पाप की महल-अटारियां बना चुका है। महाकुंभ में हर ग्रह से लोग अपने ‘स्पेस-यॉट’ में बैठकर दर्शन करने आ रहे हैं। एक साथ इतनी सारी प्रजातियां, इतने सारे एलियन-भक्त, एक ही गंगा में! वर्चुअल दर्शन चैनल का एंकर हवा में तैरते हुए बता रहा है, ‘देखिए, यह हैं रोबोटिक पंडित जी, जो श्रद्धालुओं को वर्चुअली आशीर्वाद दे रहे हैं।’ और श्रद्धालु अपने वर्चुअल रियलिटी हेडसेट लगाकर घर बैठे ही कुंभ का पूरा अनुभव ले रहे हैं।
ईश्वर से अब तो यही प्रार्थना है कि आनेवाले 144 साल के बीच चाहे जिस-जिस चोले से गुजारना हो, गुजार देना। कीड़ा, मकोड़ा, जानवर, एलियन… जो मर्जी सो बना देना। लेकिन उस वाले महाकुंभ में भी इंसानी चोला मत देना! क्योंकि मानव का चोला मिला तो फिर से वही कामचोरी, वही आलस्य, वही बहाने। और फिर से 144 साल का इंतजार। इससे अच्छा है कि कोई ‘डिजिटल आत्मा’ ही बना देना, जो सीधे क्लाउड में डुबकी लगा ले और मोक्ष पा जाए!
