
आरा/भोजपुर 26 जून।वैसे तो देश में तीन बार आपातकाल लगाए गए हैं लेकिन आज से 50 साल पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1975 से 1977 तक कुल 21 महीने तक आपातकाल लगाकर न केवल सत्ता का दुरुपयोग किया गया अपितु संविधान की मुल आत्मा पर भी कुठाराघात किया गया,लोकतंत्र की हत्या की गई जिसे इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है।
।इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता व युवा नेता भुवन पांडेय से वरिष्ठ पत्रकार डा दिनेश प्रसाद सिन्हा ने बातचीत कर स्मृतियों को जानने की कोशिश की है।
राष्ट्रपति शासन कौन लगता है कि जवाब में इन्होंने बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद अनुच्छेद 352 का उपयोग करते हुए मंत्रिमंडल के लिखित दोनों सदनों के अनुमोदन पर राष्ट्रपति आपातकाल लगाने की घोषणा की। जिसके माध्यम से प्रधानमंत्री को डिक्री द्वारा शासन करने , चुनाव रद्द करने और नागरिक स्वतंत्रता को निलंबित का अधिकार मिला।
क्यों लगाया गया कि जवाब में इन्होंने बताया कि राजनीतिक अशांति और आंतरिक गड़बड़ी ही इसके मुख्य कारण है। आपातकाल में दुरूपयोग के संबंध में बताया कि मौलिक अधिकारों का दुरुपयोग ,बड़ी संख्या में राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी,प्रेस पर न्यूज़ के लिए सेंसरशिप , सरकार विरोधी पत्रकारों की गिरफ्तारियां, अंतरिक्ष सुरक्षा अधिनियम और रक्षा भारत नियम में बंदी बनाया गया, जबरन 8 वर्ष से लेकर 80 वर्ष के लोगों का जबर्दस्ती नसबंदी कराया, राष्ट्रीय सेवक संघ व अन्य संगठनों को बैन किया गया,न्यायपालिका पद अंकुश लगा।गांधी शासन द्वारा एक लाख से अधिक से अधिक राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और असंतुष्टों को कैद किया गया,बेटे संजय गांधी द्वारा जबरन नसबंदी से आम लोग कांप गये। प्रमुख गिरफ्तार लोगों में विजया राज सिंधिया , जयप्रकाश नारायण , मुलायम सिंह यादव , राज नारायण , मोरारजी देसाई , चरण सिंह , जग जीवन राम, आचार्य कृपलानी , जॉर्ज फर्नांडीस , अनंतराम जायसवाल , अटल बिहारी वाजपेयी , लाल कृष्ण आडवाणी , अरुण जेटली, जय किशन गुप्ता, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, गायत्री देवी (जयपुर की रानी), और अन्य विरोध नेताओं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के साथ – साथ कुछ राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।कांग्रेस के जिन नेताओं ने आपातकाल की घोषणा और संविधान संशोधन के खिलाफ असहमति जताई, जैसे मोहन धारिया और चंद्रशेखर , उन्होंने अपनी सरकार और पार्टी के पदों से इस्तीफा दे दिया और उसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नजरबंद कर दिया गया।डीएमके जैसे क्षेत्रीय विपक्षी दलों के सदस्यों को भी गिरफ्तार किया गया।इनमें से अधिकतर गिरफ्तारियां मीसा , डीआईएसआईआर और कोफेपोसा जैसे कानूनों के तहत हुईं । आपातकाल के दौरान मीसा के तहत 34,988 लोग, डीआईएसआईआर के तहत 75,818 लोग गिरफ्तार किए गए।
राजन मामले में कालीकट के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज के पी. राजन को 1 मार्च 1976 को केरल में पुलिस ने गिरफ़्तार किया,हिरासत में उन्हें तब तक प्रताड़ित किया गया जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हो गई और फिर उनके शव को ठिकाने लगा दिया गया और कभी बरामद नहीं किया गया। इस घटना के तथ्य केरल उच्च न्यायालय में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण मुकदमे के कारण सामने आए । ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें किशोरों को गिरफ़्तार करके जेल भेजा गया, ऐसा ही एक उदाहरण दिलीप शर्मा का है, जिसकी उम्र 16 साल थी और उसे गिरफ़्तार करके 11 महीने से ज़्यादा जेल में रखा गया। 29 जुलाई 1976 को पटना उच्च न्यायालय के फ़ैसले के आधार पर उसे रिहा कर दिया गया।कांग्रेस पार्टी के लोग जितना भी प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा जी के कार्यों का गुणगान कर लें लेकिन इस आपातकाल को लोग इतिहास के पन्नों में काला अध्याय के रूप में जानते हैं।
