
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)08 मई।विश्व के प्रसिद्ध मनिषी संत श्री त्रिदण्डी स्वामी जी महाराज के समर्थ शिष्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयरा स्वामी जी महाराज की सन्निधि में चौराई में आयोजित श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ सह काली दुर्गा प्राण-प्रतिष्ठा यज्ञ अन्तर्गत संचालित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह यज्ञ तीसरे दिवस जीयर स्वामी जी महाराज के कृपा पात्र ब्रह्मपुरपीठाधीश्वर ज.गु.रा.विद्या वाचस्पति आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज ने वेदव्यास जी के मन मे उत्पन्न विसाद को मिटाने व शांति हेतु देवर्षिनारद जी द्वारा बताए गये मार्ग पर प्रकाश डालते हुए द्रौपदी, उत्तरा,सुभद्रा और कुंती के दिव्य चरित्र की कथा कही।पुनः देवर्षिनारद के तीन जन्मो की कथा सुनाते हुए विदुर मैत्रेय संवाद की चर्चा करते हुए कहा कि जो है नही,पर है जैसा लगता है वह माया है।माया से छुटकारा पाने का उपाय है.मायापति की शरणागति।जैसे ही जीव मायापति के शरण मे जाता है वैसे ही माया मानव जीवन मे बाधक नहीं,वरन साधक ,सहयोगी बन जाती है।आगे आचार्य जी ने कहा भगवान को साधन से नही, साधना से नहीं, वरन भाव से ,भक्ति से ,गुरू कृपा से प्राप्त किया जा सकता है।भगवान को भाव,प्रेम प्रिय है। राम ही केवल प्रेम पिआरा, जान लेहु जो जाननि हारा। साथ ही श्रृष्टि विस्तार कथा करते हुए मनु शतरूपा के पुत्र उत्तानपाद, प्रिय व्रत और पुत्रियां देवहूति, आकुति ,प्रसुति के वंश की दिव्य कथा को प्रस्तुत करते हुये सती चरित्र का वर्णन करते हुये शिवपार्वती विवाह की झांकी सहित प्रस्तुत करते हुए विवाह संस्था में प्रविष्ट कुरीतियों के निवारणार्थ तिलक दहेज मुक्त ,प्रदर्शन रहित विवाह संस्कार संवर्धन हेतु आग्रह किया। कथा सुनते हुए भक्त विहृल हो जाते , कथामृत का पान करते अघाते नहीं।। श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने हेतु आरन्य प्रक्षेत्र के स्त्री पुरुष पधार रहे हैं। प्रबंध व्यवस्था में यज्ञ समिति को स्थानीय भक्त व जवार लोग भक्ति भाव से सक्रिय सहयोग कर रहे हैं।
