
बक्सर /बिहार ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)04 अप्रैल।भारत के प्रसिद्ध संत जीयरस्वामीजीके कृपा पात्र ब्रह्मपुरपीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज द्वारा नौ दिवसीय मानस महोत्सव के पंचम दिवस पर नवधा भक्ति की चर्चा करते हुये सबरी माता और सीताराम संवाद का सार्थक आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत की। आचार्य जी भक्ति तत्व को निरूपित करते हुए कहा भक्ति ही मुक्ति का समर्थ साधन है ,इससे मानवमात्र का कल्याण संभव है,बस शर्त इतना ही है कि मानव भक्ति पथ का पथिक बन जाय।। भक्ति नव प्रकार की होती है जिसका शुभारंभ सत्संग, कथा श्रवण से होता है। भक्ति का सहज अर्थ है भगवदार्पण, भगवान का होजाना, अपने हर कार्य कै भगवान से जोड़ देना।भगवान हमारे हैं ,हम भगवान के हैं,भगवान के नाते ही संसार से नाता मानना। सियाराममय सब जगजानी,करो प्रणाम जोरिजुग पानी। भक्ति श्रद्धा, सत्यसंकल्प, आस्था, समर्पण, सत्संग से पूष्ट होती है।भक्ति की कसौटी हर हाल मे प्रसन्न रहनाऔर नारायण के प्रति प्रपन्न रहना है। कथा श्रवण करने दूरदराज कू गाँव सू प्रबुद्ध जन व श्रद्धालु आरहे हैं।कथा सुनने वालो के लिए अनुकूल व्यवस्था बनाने मूं शिवशक्ति पीठम् गौरीशंकर विवाह महोत्सव कै कार्यकर्ता लगू रहते हैं।प्रतिवेदक प्रवचनसंकलनकर्त सुमनरामानुज वैष्णव दास थे।

