जन प्रतिनिधि
हे मेरे मतदाता ! मुझको, एक बार संसद पहुँचाते; बिती बिगड़ी हुई छबि को, बस एक बार भूल जाते ।
दिल्ली जाते, बँगला पाते, मुफ्त सैर का टिकट पाते; जोड़-तोड़ में माहिर जो हैं, मंत्री तक बन जाते।
झान गंगाजल पीया तनिक, पर विधि की निधि बनाते; आगे-पीछे लगे लोग से, बस नेता जी कहलाते ।
कुछ दिन समस्या समझ रहे हैं, कहकर के समझाते; जनता को बस धैर्य धरो का, एक-एक घूँट पिलाते ।
मिली विरासत जर्जर हालत, कहकर आँसू खुब बहाते; राह सद्भावना का स्वतः ही, बिन प्रयास बन जाते ।
करते गठित आयोग, प्रतिवेदन का इंतजार करवाते; इसी तरह बस दायें-बायें में, तीन साल कट जाते।
आयोगों के बाद, अध्ययन समिति एक और बनवाते; एक समिति मंत्री स्तर फिर बनवाते, चार साल कट जाते।
तत्पश्चात् समस्या पर, एक बहस आम करवाते; चाबुक का बस भय दिखलाकर, ध्वनि मत से ही पास करवाते ।
अगर समस्या सुधर न पाती, वार्त्ता तो फिर-पिर करवाते; चार साल जब ऐसा जाता, फिर कुछ ढील दिखाते ।
चीनी, तेल और प्याज के भावों पर, अपनी नज़र गड़ाते; दूरभाष और गैस कनेक्शन देकर के, आगे का मार्ग बनाते ।
आश्वासन आरक्षण टिकटों में, देना नहीं भुलाते; देता नहीं तनिक मगर, संसद के बदले पंचायत दिखलाते ।
मंहगाई की छाप स्वयं पर, तनिक कभी नहीं पड़ने देता; देश भँवर में रहे मगर, निज वेतन भत्ता तो बढ़वा ही लेता ।
तैंतीस के बदले बस पाँच साल में, पेंशन हम पा जाते; अपने बाद बस अपने लल्ला को, झंडा देते जाते।
संसद मत से अगर न देखा, एक दुआ बस इतना करते; आम राय से सिर पर रखते, तुम टुकुर-टुकुर बस देखा करते।
हे मेरे मतदाता, मुझको, एक बार संसद पहुँचाते; तो मैं बहलाने का हर रहस्य ‘पा जाता, और जन प्रतिनिधि कहलाता ।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की बारहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)


