होली !
होली अपार लाती आनंद
राग द्वेष भेद भुलवा
सबसे एक दूसरे पर
बरसवाती प्रीति रंग ।
परेशानियों में पड़
आदमी रहता उदास
होली ही आ सबमें
बहाती खुशियों का दरिया ।
रहता चहुँओर
मस्ती का आलम
अमीर गरीब
सब खाते पकवान
सब एक रंग में भीग
हो जाते एक सदृश ।
बह उठती खुशी की बयार
सब झूमते दल सम
सब नाचते मयूर सदृश
सब ढोल मजीरा मृदंग बजा
गाते मिल फाग ।
लहरा उठता सर्वत्र आनंद सिंधु
सब उसमें डूब
उड़ाते वैसे एक दूसरे पर गुलाल
जैसे मानों गज दल
उड़ाता हो एक दूसरे पर
मस्ती में रज।
अजब दिखता
उस दिन लोगों मध्य
भाईचारा का माहौल
बच्चे बूढ़े जवान
सब एक दूसरे से गले मिल
कहते होली मुबारक ।


