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जितिया व्रत : धर्मदेव सिंह

रचनाकार: धर्मदेव सिंह

जितिया व्रत

जब माँ पुत्र को
खिलाती गली बासी रोटी
माँ के नेत्र से
बह चलते अश्रु ।

पुत्र पूछ देता
माँ ! क्यों तुम हो रोती?
क्या तबीयत ठीक नहीं है तुम्हारी?

नहीं बेटा
कुछ नहीं हुआ है मुझे
ऐसे ही गिर पड़े अश्रु नयन से।

नहीं माँ! ऐसे नहीं गिरते अश्रु
जरूर कोई शोक है भीतर तुम्हारे
छुपा रही हो तुम मुझसे।

तुम्हारे अश्रु देख माँ
खाया नहीं जाता मुझसे।

नहीं खालो बेटा खालो
मत पूछो क्यों अश्रु बहे नेत्र से
रहने दो मेरे मन की व्यथा मन में।

नहीं माँ! जबतक नहीं बताओगी तुम
खाऊँगा नहीं रोटी तुम्हारे हाथ से
सो जाऊँगा खाट पर भूखे।

नहीं मेरा लाल! मत सोओ भूखे
जिद धर ली जब तुमने
तब सुनो मेरा शोक ध्यान से।

तुम्हारे जन्म से पहले
मर चुके हैं दो भाई तुम्हारे
उनके ही शोक में
बह पड़े अश्रु नयन से।

अब तुमको न खो पाऊँ
यही सोच
अन्न जल तज
किया है मैंने जितिया व्रत लाल ।

लेकिन माँ!
सृष्टि का नियम है
जन्म लेना और मरना
किसी व्रत से
इसका रहता नहीं संबंध
लाख कामना करो मुझे जीने के लिए तुम
पर माँ मेरी मृत्यु निश्चित है एक दिन।

यहाँ रोज ही बच्चे
अल्पायु में ही मर मर
जल रहे श्मशान में
कहाँ कोई माँ
जितिया व्रत कर
दीर्घकाल तक
बचा पा रही निज लाल !

युद्ध में
अधिकांश माँओं के लाल
अल्पायु में ही हो जा रहे शहीद जितिया व्रत कर कर भी
ये कहाँ देख पा रहीं
निज सुत को
जीवित दीर्घकाल तक!

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