मातृभाषा हमारी भावनाओं, संस्कारों और आत्मा से जुड़ी है, संरक्षण की शुरुआत घर से हो : अजय बोकिल
तकनीक मातृभाषाओं के विस्तार का सशक्त माध्यम, पत्रकारिता में सत्यापन और विश्वसनीयता जरूरी : अब्दुल वदूद साजिद
भारतीय भाषाई विविधता कमजोरी नहीं, देश की बड़ी ताकत : समुद्रगुप्त कश्यप
भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)16 सितंबर। भारत भवन में आयोजित ‘भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान’ के दूसरे दिन ‘डिजिटल युग में मातृभाषाएँ : संकट, संभावना और नई पत्रकारिता’ विषय पर विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषाओं का संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, मीडिया और नई पीढ़ी को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी। डिजिटल तकनीक भारतीय भाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ने और उनके विस्तार का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के अंतर्गत वीर भारत न्यास एवं संस्कृति संचालनालय द्वारा आयोजित सत्र का संचालन भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला ने किया। सत्र में ‘सुबह सवेरे’ भोपाल के कार्यकारी प्रधान संपादक अजय बोकिल, इंकलाब उर्दू दैनिक, दैनिक जागरण समूह के अब्दुल वदूद साजिद तथा वरिष्ठ पत्रकार समुद्रगुप्त कश्यप ने मातृभाषा, भाषाई विविधता, डिजिटल तकनीक और बदलती पत्रकारिता पर विचार रखे।
मातृभाषा से भावनात्मक रिश्ता
अजय बोकिल ने कहा कि मातृभाषा महज संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति की भावनाओं, संस्कारों और आत्मा से जुड़ी होती है। आज कई परिवारों में बच्चों से मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी में बातचीत की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में मातृभाषा के संरक्षण की शुरुआत घर से ही करनी होगी। माता-पिता बच्चों से अपनी मातृभाषा में संवाद करें और बचपन से ही उन्हें भाषा एवं संस्कृति से जोड़ें।
उन्होंने साइबर ठगी की एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने उनके बेटे के नाम पर उनसे बात करने की कोशिश की। जब उसने हिंदी में बात की तो उन्हें संदेह हुआ, क्योंकि उनके बेटे से वे मराठी में संवाद करते हैं। बोकिल ने कहा कि मातृभाषा पारिवारिक और भावनात्मक संबंधों को मजबूत करने के साथ हमारी पहचान का भी आधार है।
भाषा की उपेक्षा से संस्कृति से दूरी का खतरा
अब्दुल वदूद साजिद ने कहा कि मातृभाषा से गफलत अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक जड़ों से दूरी का कारण बन सकती है। हिंदी और उर्दू के संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों भाषाओं में लंबे समय से शब्दों और भावों का निरंतर आदान-प्रदान रहा है। भारत की भाषाएँ एक-दूसरे से सीखकर और शब्द-भाव ग्रहण करके समृद्ध हुई हैं।
उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक मातृभाषाओं के लिए चुनौती होने के साथ नई संभावनाएँ भी लेकर आई है। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने सूचना प्रसार को आसान बनाया है, लेकिन पत्रकारिता में सत्यापन, जिम्मेदारी और नैतिकता के मूल सिद्धांतों का पालन आवश्यक है। उन्होंने मशीन आधारित अनुवाद में संदर्भ और भाव के बदल जाने की संभावना की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि तकनीक के इस्तेमाल में भाषा की संवेदना को समझना जरूरी है।
भाषाई विविधता भारत की ताकत
समुद्रगुप्त कश्यप ने असमिया भाषा में लगभग 500 वर्ष पुरानी कविता का पाठ करते हुए अपने वक्तव्य की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि यह रचना श्रीमंत शंकरदेव की है, जिन्होंने कविता, गीत, नाटक, नृत्य, अभिनय और चित्रकला जैसे अनेक माध्यमों का उपयोग समाज तक संदेश पहुंचाने के लिए किया। उन्होंने कहा कि शंकरदेव की यह संचार परंपरा आज के डिजिटल युग में भी प्रासंगिक है।
कश्यप ने कहा कि उनकी मातृभाषा असमिया होने के बावजूद उन्हें स्कूल और कॉलेज में असमिया माध्यम से पढ़ने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने भाषा के प्रति सम्मान को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता बताई। नागालैंड के भाषाई परिदृश्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न जनजातियों के बीच संपर्क और संवाद से भाषाई आदान-प्रदान की नई परंपराएँ विकसित हुई हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बड़ी ताकत है। भारतीय भाषाएँ सदियों से एक-दूसरे के शब्द, विचार, भाव और सांस्कृतिक अनुभव ग्रहण कर समृद्ध होती रही हैं। डिजिटल माध्यमों के जरिए इस विविधता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को मजबूत करने की आवश्यकता है।

