
भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)04 जुलाई।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल में प्रत्येक माह आयोजित होने वाली “माह का प्रादर्श” श्रृंखला के अंतर्गत इस माह बिहार के मधुबनी जिले से संकलित पारंपरिक पीतल निर्मित “खाना डिब्बा” (Brass-made Tiffin Carrier) प्रादर्श का उद्घाटन शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 को अपराह्न 2:30 बजे संग्रहालय परिसर में दीप प्रज्वलन के साथ सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रो. शिवप्रसाद रामभटला, हैदराबाद एवं प्रो. सुनीता रेड्डी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे ने पुष्पगुच्छ एवं संग्रहालय का स्मृति-चिह्न भेंट कर स्वागत किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. अमिताभ पांडे ने भारतीय पारंपरिक धातु शिल्प, भोजन संस्कृति तथा लोकजीवन में ऐसे उपयोगी पात्रों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संग्रहालय का उद्देश्य केवल वस्तुओं का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी लोक परंपराओं, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को समाज के समक्ष जीवंत रूप में प्रस्तुत करना भी है।
इस अवसर पर उपस्थित अधिकारियों एवं आगंतुकों में डॉ. सोमा किरो, डॉ. एस. के. पांडे, राजेंद्र झारिया, डॉ. पी. शंकर राव, डॉ. सुदीपा रॉय, डॉ. पी. अनुराधा, एन. सकमाचा सिंह, तपस विश्वास, गरिमा आनंद, डॉ. प्रीतम चौधरी, दीपक चौधरी, राजीव जैन, डीडी सेनापति, ललित बागुल, डॉ. रविंद्र गुप्ता, डॉ. मोहनलाल, अतुल पांडे, डॉ शिखा तहेंगुरिया आदि सहित पीजीडीएम के छात्र-छात्राएँ तथा बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।
प्रदर्शित “खाना डिब्बा” बिहार के मधुबनी जिले के भूडिहार लोक समुदाय से संबंधित है, जिसे स्थानीय कसेरा समुदाय के शिल्पकारों द्वारा पीतल की चादर को पीटकर एवं आकार देकर हस्तनिर्मित किया जाता है।
इस प्रादर्श का संकलन संग्रहालय के सहायक कीपर श्रीकांत द्वारा किया गया था। इस “माह के प्रादर्श” कार्यक्रम का संयोजन भी श्रीकांत द्वारा किया गया।
प्रादर्श का परिचय देते हुए श्रीकांत ने बताया कि यह पारंपरिक टिफ़िन तीन समान आकार के पीतल के पात्रों से मिलकर बना होता है, जिन्हें एक के ऊपर एक क्रमबद्ध रूप से रखा जाता है तथा दोनों ओर लगी चम्मचाकार लंबी पीतल की लॉकिंग छड़ों द्वारा मजबूती से बंद रखा जाता है। सबसे ऊपरी पात्र में दाल, खीर अथवा अन्य तरल खाद्य पदार्थ तथा नीचे के पात्रों में चावल, सब्ज़ी एवं अन्य व्यंजन रखे जाते थे। इसके ऊपरी भाग में लगा मजबूत पीतल का हैंडल इसे खेतों, यात्राओं तथा दैनिक आवागमन के दौरान भोजन ले जाने के लिए अत्यंत सुविधाजनक बनाता है।
उन्होंने बताया कि निर्माण तकनीक की दृष्टि से यह भारतीय धातु-शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। पीतल की चादर को गोल आकार में काटकर हथौड़ी एवं साँचों की सहायता से कटोरानुमा रूप दिया जाता है। प्रत्येक पात्र के ऊपरी एवं निचले भाग अलग-अलग तैयार कर उन्हें इस प्रकार जोड़ा जाता है कि पूरा पात्र कलश के समान दिखाई देता है। अंततः हैंडल एवं लॉकिंग रॉड लगाकर इसे उपयोग योग्य बनाया जाता है।
यह प्रादर्श भारतीय पारंपरिक भोजन संस्कृति, धातु-कारीगरी तथा सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि है। ग्रामीण एवं शहरी परिवारों में भोजन सुरक्षित रखने और ले जाने के साथ-साथ धार्मिक यात्राओं, मेलों, त्योहारों तथा पारिवारिक आयोजनों में भी इसका व्यापक उपयोग होता रहा है। भारतीय संस्कृति में पीतल एवं काँसे को शुभ एवं पवित्र धातु माना जाता है, इसलिए ऐसे पात्रों का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी विशेष रहा है।
बिहार के मधुबनी के अतिरिक्त यह पारंपरिक धातु पात्र दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, भागलपुर, बेगूसराय तथा पटना के पुराने बाजारों में भी देखने को मिलता है।
कार्यक्रम का संचालन संग्रहालय के प्रकाशन एवं सोशल मीडिया प्रभारी डॉ. मोहम्मद रेहान ने किया।
संग्रहालय के जनसंपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि संग्रहालय द्वारा प्रत्येक माह ऐसे विशिष्ट प्रादर्श प्रदर्शित किए जाते हैं, जो देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों से संकलित किए गए हैं तथा जिनका वर्तमान समय में उपयोग और उपलब्धता अत्यंत सीमित रह गई है। इन दुर्लभ सांस्कृतिक धरोहरों के प्रदर्शन के माध्यम से संग्रहालय देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और विविधता से आमजन को निकटता से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। यह प्रादर्श भारत की समृद्ध शिल्प परंपरा, लोकज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का सशक्त परिचायक है।
