वतन खातिर
हम हई भारत के संतान,
हम ना हईं हिन्दू भा मुसलमान।
का हईं ? फरियावे के ई अवसर नइखे,
देश पर मर मिटे के बा, दोसर नइखे ।
जब तक जढ़ बनल रहवऽ,
आपस में तू लड़त रहबऽ,
अंतहीन झगड़ा में जब पड़ल रहबऽ, सौतन अस जब तक झोंटा नोचउवल करत रहबऽ,
केहू गपच जाई, जब तक गफलत में पड़त रहबऽ।
एके हवा पानी, धरती पर पैदा भइली,
केहू बड़, केहू छोट, कइसे में भइल ? फिर भेद-भाव कवनो पागल ही कइले होइहें,
कवनो बेवकुफ के हाथे जाति सम्प्रदाय गढ़ाइल होइहें।
कवनो मूर्ख के हाथ ई दीवार खींचाइल होइहें,
आपन विनाश के कुँआ ऊहे खोदले होइहें,
झटका, पटका के ऊहे राह बनवले होइहें।
जब गाय के पोंछ पकड़ वैतरणी पार कर पाइब,
छुवला से फिर सुअर कबो जन्नत से ना गिरे पाइब।
भजन, आजान के भेद, एकता के पोत में छेद कर दीही,
आपस में लड़ा-लड़ा, एक दूसरा के जान ले लीही।
बस भूल जाईं कि हम हिन्दू भा मुसलमान हईं ,
वतन के काम आईं हम, एक वतन भारत के संतान हईं।

(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

