
गोहरावन
भोले शंकर ई का कइलीं
तकथइया तकथइया कइली
भंगिया खा निसिआइल रहके, भस्मासुर पूजा पर गदगद भइलीं? ।।
फिर रखी हाथ राउर माथ पर,
अपना करनी से अपने फंसलीं;
अब काहे छछनत भगलीं त्रिलोकी, डर से काहे गुप्ताधाम में घुसलीं ।।
छोड़ीं अब ई ढढ़नच आगे सोचीं,
मत करीं काम अँखमुदा तनि सोचीं।।
असुर सुर के रूप बनाई,
आना नीमन से चिन्हबऽ;
अइसने हाल हो वे लागी,
फिर कइसे रवा पुजाइबऽ ।।
तकथइया छोड़ ताण्डव करे पड़ी, जटा खोल वीरभद्र के पेठवे पड़ौ ।।
नइखे घर ओह से का,
संउसे दुनिया रउरे घर,
रउरे धरती, रउरे सब शिखर शैल, कवनो बड़ कोठी से बडुवे खूबे फैल बड़ा नीक बा पोसले बानी बैल ।।
नाहक में डरवइलीं ठकुराइन के मड़वा में,
एही से परीछ ना पावल केहू लोढ़वा से ।।
गउरा भीरी भांला, तू रखलऽ त्रिशुल, कार्त्तिकेय के तीर, फरसा लम्बोदर के मूल ।।
बड़ा नीक बा राउर फौज,
बाकीर बानी बड़ मन मौज,
मत करीं अब आँउज-माँउज,
ना त परबत होइहें खाँउज-माँउज ॥
कार्त्तिकेय के दक्खिन भेजीं,
एक दन्त के पश्चिम में,
हिम शैल पर अपने रहबऽ,
गउरा दुर्गा रहस पूरब में ।।
घरवा खातिर त बैले काफी बा,
ढही आवत रही जे खूँटा के पासे आई;
चारो चौगेठा जब पहरा रही,
हर हर हर हर के गूंज सुनाई ।।

