
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)12 जून।वेतन और पेंशन पर उठते प्रश्न आत्मसम्मान और आत्मग्लानि से भर जाता है।चार महीने से वेतन नहीं। चार महीने से पेंशन नहीं। नब्बे वर्ष के सेवानिवृत्त प्रोफेसर दवा के पैसे नहीं जुटा पा रहे और सरकार 211 नए कॉलेज खोलने की घोषणाएँ कर रही है। यह विडम्बना नहीं — यह पाखंड है।फाइलों में उलझाने का खेल बंद हो।2018 में उच्च न्यायालय का आदेश। 2023 में ACS का आश्वासन। 2026 में — वही फ़ाइल, वही बहाना, वही पीड़ा। सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कह चुका है: पेंशन संवैधानिक अधिकार है, दया-भिक्षा नहीं। ₹90,000 करोड़ के UC पूरे राज्य में लंबित हैं — तो केवल विश्वविद्यालयों को दंड क्यों? यह लाल-फीताशाही नहीं — यह सुनियोजित उपेक्षा है। विश्वविद्यालय सबसे आसान ‘सॉफ्ट टारगेट’ हैं।हर बजट कटौती, हर विलंब, हर बहाने की पहली मार शिक्षकों और छात्रों पर पड़ती है। यह सोच राष्ट्रहित के विरुद्ध है।महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ही राष्ट्र की बौद्धिक शक्ति जन्म लेती है। यहीं असाधारण प्रतिभाएँ उभरती हैं जो भारत को AI, Semiconductor, Quantum Computing और अंतरिक्ष विज्ञान की वैश्विक दौड़ में आगे ले जाएँगी।अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान सब अपने विश्वविद्यालयों में अरबों लगा रहे हैं। हम अपने प्रोफेसरों को आधुनिक सुविधाएँ तो दूर चार महीने से वेतन नहीं दे पा रहे।विश्वविद्यालयों को कमज़ोर करना भविष्य कमज़ोर करना है।यदि संसाधन कम हैं तो समाधान शिक्षा का गला घोंटना नहीं।राष्ट्र महान बनता है घोषणाओं से नहीं मानव संसाधन से।बिहार को बाधाओं की नहीं — नवाचार की संस्कृति चाहिए। एक आवाज़ जो अब चुप रहने से इंकार करती है।
