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समर सोपान

समर सोपान

पर्वत के ऊँचका चोटी,
कबहुँ रहे शिखर के शिखर,
लागल आज हाहाकार कर,
ऊहे लुढ़क पड़ल।

लागल जलत सूरज,
आज आसमान से,
टूट के गिर पड़ल।

पानी फेरत कौरव
सेना के बल उपर;
भीष्म पितामह आज
गिरलन धरती पर।

कुरूकुल के चमकत
मुकुट गिरल
बूढ़ा बाज गिरल
थाक धरती पर।

धरते – धरती भीष्म के देखते,

रणभूमि में मातम पसरल;
दुर्योधन के धीरज टूटल,
अर्जुन के कलेजा फाटल।

सुखते लोर रोवला के बाद,
नयका जोश भर आइल;
लागल माथ पर चमकत,
दोसर सूरज झट आइल।

कौरव के बल अब,
अपने आप जाग उठल,
लोहा लेवे अब राधा सुत,
देखते देखात जाग उठल ।

बचल भार अब ओने,
गुरुद्रोण ही थमले;
सेना के लगाम अब
गुरु द्रोण ही थमलें।

जेकरा ईरखा से अलगे अबतक,

रहलन कर्ण मुँह सिअले अबतक;

उनकर आशिष के लेवे खातिर,

आपन वीर के धरम निभावे खातिर।

बाण पर पितामह
जहाँ टंगाइल बाड्न;
नम्रता में डूबल ओनही,
कर्ण अब बढ़ल बाड़न।

पहुँच पास पितामह के,
चरणन के छुवलन;
रूधल गला से,
राधेय ई बोललन।

हे तात, अर्धरथी कह,
जेकर मान घटावत रहीं,
जे कर ना कबहू रउवा,
उत्साह बढ़ावत रहीं।

हे तात, ऊहे अब,
सोझा में आइल बा;
आँसू के उपहार,
साथ ले आइल बा।

हुकुम होइत त
धेनुहा धरती;
समर बीच कुछ,
हमहूँ काम देखइतीं।

देखतीं कइसन काल,
रण बीच उतरल बा;
केकरा डर से ई,
धरती डोलत बा।

जीत के माला हम,
दुर्योधन के पहनइतीं;
नाहिं त रण में अपने,
वीर गति के पइतीं।

गुनाह हो खो दास केत,
अब माफ कर दीहीं;
आशिष के आपन हाथ,
हमरा माथ रख दीहीं।

आखिरी अवसर बा,
रउवा से मिले के;
लागत बा अब,
रहे पड़ी अकेले में।

छोड़ भ्रान्ति, अहंकार,
हम आइल बानी;
चरण के धूल मांगे,
अब आइल बानी।

जल भरल नयन से,
जब देखखलन भीष्म,
कर्ण के आँख गीला,
जब देखखलन भीष्म ।

खींच पास कर्ण के
ले अइलन भीष्म;
छाती साट उनका,
गले लगइलन भीष्म।

बोललन अब कवन,
चीज बा बाँचल;
बेटा अब त खाली,
आँसुवे बा बाँचल।

बारम्बार हम कहत रहीं;
हठी दुर्योधन से कहत रहीं।

भला-बुरा का होला,
ऊ सुनत ना रहन;
कहल हमार ऊ,
मानत ना रहन।

घमंडे मातल खीसी,
आँख मूंद व्याकुल रहलन;
युद्ध माथ बकुअइले,
अतहत बड़ आवत रहे।

बोल कर्ण, अब कइसन लागत बा?

केकर लोग ना अब रोवत बा?
केकर आदर, केकर सिंगार ना बूझत बा?
अब त दूनों ओर ओसही जलत बा।

केकर ना घर बार उजड़त बा?
संउसे समाज नरक में डूबत बा
बोल कर्ण, के मारत बा, के मरत बा?

दुश्मनी के दावानल अब कइसे दहकत बा?

के कर धन अब बाँचल रही ?
के कर सुहाग ना लूटल जाई?
बैर के आग में झकोराये से,
का के हुवो बाँचपाई ?
भाई, भाई के दुश्मन होइहें,
वंश के वंश रोवत रह जइहें।

हे पुत्र, तनिका ठहर के सोचऽ,
केने ले जाई ई बड़का रण?
कवन नतीजा होइहें आगे,
कवन फायदा होइहें रण से।

जब बँच ना सकिहें मानवता,
तब का करिहें जीत के तगमा।

कर्ण, हमरे अइसन तू गौरव बाड़ऽ,

निश्छल, पवित्र, गुणी, ज्ञानी बाड़ऽ।

कडुवा बात जे बोलत रहीं
पर मन तोड़ल चाहत ना रहीं;
हम ना केवल निन्दक ही रहीं,
मनेमन कर्ण प्रशंसक रहीं।

दुर्योधन तोहरे सलाह पर चलत रहलें,

मुँह विदकवले, हमरो बात ना मानत रहलें।
तोहरा से बड़ कवनो वीर ना रहलें,

जेकरा के मनती, केहू ना रहलें।

कर्ण, तुहू बड़ा धनुधारी बाड़ ऽ,

केशव अस रण भट भारी बाड़ऽ।

तू धरम रक्षक निरमल बाड़ऽ,

दीन-दलित हितकर बाड़ ऽ।

अर्जुन साथे जस केशव बाड़े,
कौरव दल खातिर, तू ओसही बाड़ऽ।

लेकिन वीर का खाली,
धेनुहा से चिन्हल जइहें
कि शान्ति खातिर वीर,
इमान से मेहनत करिहें।

कि लागल आग बुतइहें ऊ कबहूँ ?

कि लड़ते जान गवइहें अबहूँ ?

दुर्योधन यदि कहना मानस तोहरो,

शान्ति खातिर कर काम, नाम -कमा लऽ,
युद्ध रोकवावे में मदद करके,
छोड़ लड़ाई शान्ति में नाम कमा लऽ।

यदि तोहरा रोकला से,
कहीं रण जइहें खुद रूक;
कहे लगिहें लोग,
तोहरा से मिलल सुख्ख।

जाके दुर्योधन से कहिह,
मन के पाप धोवस ऊहो;
पांडव से अंकवारी धर मिलस,
सुख शान्ति से हमरा मरे देस ऊहो।

मरते बेरी हम सबके देखीं,
पूरा खान्दान सुख में देखीं।

कहे लगलन कर्ण, बात भीष्म से,

कहलन ऊ घायल बूढ़ा सिंह से।

अबहू का कवनो राह बचल बा ?

सागर के बीच नाव फंसल बा
जिनगी त आफत में पड़ल बा,
दोसर ना कवनो राह दिखत बा।

शान्ति बा एक छोर पर,
दोसर घाट जीत बा लउकत;
दरिया बीच नाव के घाट जाये में,

आगे बढ़ल छोड़ ना राह बा लउकत।

जय पवले बीन सुस्ताये के नइखे,

एह घड़ी हाथ मिलावे के नइखे ।

ठोकी पीठ धूर ना लागे,
लेके लौटी जीत, राउर चरण भुलाये के नइखे।

आशीर्वाद रही, नाव ओह घाट लगाइब,
चढ़ दुर्योधन के विजय घाट पहुँचाइब।

सोजहग राह के दिन बीत चुकल,

आगे के राह बा टेढ़ बचल।

छुटला खातिर ना लालच बा
पाँव पीछा ना जइहें जब बढ़ल बा।

जीत के लौटे के एक निशाना बा,

दुश्मन के थूरल मूडी निशाना बा।

थोड़े दिन प्राण रोकलें रहीं,
महासमर रउवा देखत रहीं।

युद्ध के घूरे घूर उड़ाइब हमहूँ,
एक से एक खेल खेलाइब हमहूँ।

अबहीं रउवा मुँह फेरी मत,
हमार बल रउवा तोड़ी मत।

मनौती हमार बा पूरा होवे दीं,
बैरी से बदला फेरे दी।

अकुलाइल यम कर्ण,
सागर अस दहाड़ उठल;
खीसी दुश्मन पर कर्ण के,
जान मरवा बाण छूटल।

वाण छुटते आग उगलाये लागल,

पांडव सेना जान बचावे भागे लागल;

बाणन के अइसन आंधी उठल,
बैरी सेना के मुखिया हिम्मत हारे लागल।

लागल कवनो भयंकर
तूफान उठल बा;
पर्वत अस के भी,
हिल प्राण उठल बा।

बैरी टूटल डाढ़ अस दूरे गिरलन,
जड़ से पेड़ उखड़े लगलन।

बाण के बाढ़ ताड़ से ऊँच,
लागल खादेरले होखे;
तीर के माटी जइसे,
सहजे खखोराइल होखे।

चाहे चकोह में कवनो सूखल पतई,

पड़ते गइल विखराइल पतई।
दुश्मन सेना के थर-थरी ले लेलस,

बड़ भयंकर हलचल कर्ण मचवलस।

रथ पर पर चढ़ल वीर,
सब रोवे लगलन,
कर्ण के काल रूप,
देखते सब रोवे लगलन।

तड़प उठलें व्याकुल हो केशव,
कुछ गूढ़बात पार्थ से कहलन केशव।

धरते तनिका दम कर्ण,
अर्जुन के ललकरलें;
दया दुश्मन पर करे कर्ण ना जानस,

कहके ऊ ललकरलें।

ई नर ना नर छीलन हवन,
बल में ई दहकावन हवन;
चाहे सागर के आग, बवन्डर यमराज के,
खिसिआइला पर ना केहू के छोड़स।

चढ़ी कोप जब इनका में,
कुछ बांच ना पायी इनका से
सब कुछ भस्म कर छोड़े लन,
मन अइला पर खाली राख भर छोड़स।

देखऽ पागल हाथी अस
कइसे बेधड़के ई घूमत बाड़े;
जे नहीं बाँह ई झोरस,
दूर तक राह साफ हो जाते बाड़े।

अर्जुन खीचबऽ ना जब गाण्डीव,

केकर गजबांक के ईहो मनिहें;
देर से काम बिगड़ जइहें,
ढीलल जान के घातक होइहें।

बुरबक मत बनऽ, जागऽ तू,
अब कड़इल बाण चलावऽ तू;
जोश ढीला जे तनिको कइलऽ,
तब रण में आज पिछड़लऽ तू।

केशव कान जे फुकलन,
सिंह अस अर्जुन दहाड़े लगलें;
अइसन लागल जइसे,
कवनो बड़ पहाड़ गरजे लगलें।

वाणन के बरसा जब झरे लागल,

भागत सेना के पग थम्हें लागल ।

अर्जुन-कर्ण अझुराये लगलन,

दूनों गरुड़ अस अझुराये लगलन।

एके गाँछ के दू-दू डाल,
एके कोख के दूनों लाल;
एके कुल के दूनों हार,
दूनों विभ्राट वीर पर्वताकार।

आपस में, पेट में तीर घपसावे लगलें,

दूनों के देह खूने-खून, पलाश अस भइलें।
दूनों पगलाइल आँधी असं उठलें,

दूनों तरफ जय साथे घहरइलें।

भैरव के सनक सवार माथ पर चढ़लें,

दूनों के आँख से आग उगलाये लगलें।

लगले में धड़ से मूंडी कट गिरे लगलन,
बहत खून-धार में पशु पाँव धोवे लगलन।

लेकिन का केहू भी रहे,
जेकर हिरदा देखते फाटत होखे;

अइसनो केहू का रहे,
जे लाश पर पैर रख टपत ना होखे।

इहे बखान बा पाँचों दिन के,
जे युद्ध द्रोण अगुआई में भइल।

लायक रहल ना केहू भी,
सब के सब धरम से उल्टा पड़ल।

जइसे छल कपट से पांडव,
भीष्म के जान से मरलें;
अपने पीछा में भले रहलें
शिखण्डी के आगे कइलें।

ओसहीं निरदयता से,
अभिमन्यु के जान ना दोसरो बकसलें;
चक्रव्यूह बीच फँसल अकेला वीर बालक के,
बाबा, चाचा, ताऊ सब मिल के मरलें।

तबहूँ भीष्म पितामह रहलन,
बनल दूनों सेना के छाया;
होके बेचैन प्राण के ऊहो,
छोड़लन साथ माया के काया।

अभिमन्यु वध के कथा,
अबहूँ तक हिरदा फाड़त बा;
सम्यता का ई हे होला ?
रो-रो सब छाती पीटत बा।

जाँहवा युद्ध में काल सोझे खड़ा होखे,
उहँवा यमराज का कबहूँ मोम अस होला?
बूढ़ जवान ना यम चिन्हेला,
सबके मारेला, बूढ़ चाहे लइका का होला?
मारल गोइले सुत के सुनते,
अर्जुन के छाती धधके लगले;
देह के रोवाँ खाड़ हो गोइलें,
जब खीसी ऊ प्रण के ठनलें।

सूरज डूबे के पहिले काल्ह जब,

जयद्रथ के मार ना पाइब;
किरिया बा धरम के तब,
आग बीच कूद अपने मर जाइब ।

अब त अर्जुन के हित खातिर ही,

प्रकृति के सुभाव फेर बदल हो गोइल;
दिन में सांझ बुझाये लागल,
दिन अछइत सूरज डूबत बुझाइल।

ऊहा-पोह में कसहूँ-कसहूँ
अर्जुन के प्रण पूरा भइल;
लुघड़ल माथ जयद्रथ के,
बाप के माथ तक चूर भइल।

ओने जब सात्यकि से ,
भूरिश्रवा अकेले निपटत रहन;
अचके वाण से उनकर,
दायाँ हाथ के कटलन।

अनशन पर भूरिश्रवा बइठ के,
जब तप साधे में लगलें;
योग साधते सात्यकि उनकर,
धड़ से माथा के कटलें।

रण मे धरम के पालन,
ई कबहू ना भइल बा;
भले दया से निकलस धरम,
पर रण में बेटा तक काटल बा।

के केकरा के कइसे कटिहें,
एके बात बस देखल जाता;
केवल एक निशाना से,
सूख मिले, समाज अपनावेला।

के कइसे सुख्ख तक जा पइहें,
ईहे बस देखल ही जाला।

धरम लक्ष्य ना हउवे केवल,
ऊ साधन ह जीवन भर साधे के;
राखल राह किनारा दिअरी अच्छा ह,

डालत जायीं तेल राह देखे के।

मत कहऽ जीत के बात,
जीत कबो दुखादेवन के होला;

बीबी, बेटा, धन, जन तक
कबहुँ पापीन के मिल जाला।

फल से धरम ना चिन्हल जाला,

नियत, उपाय से चिन्हल जाला;

लड़ला, कटला, बैर बढ़वला से,
भा दंगल से ना धरम भेंटाला।

अतनो पर जे नर मुंड छीले में,

मिलिहें धरम के जानत होखस,

जनिह माला फूलन के साथ,
धधकत आग के गथलें होखस ।

हिस्सा से बेसी हड़प चाह से,
रण होई, ना कि होई कोमल,
दया के सोजहग राह के का,
देखहूँ दीही वासना, कि होई शीतल ?
जब आँखी लोभ के माड़ा छवले होखे,
जब एक से एक बड़ पाप घेरले होखे

का अचरज बा कौरव पांडव,
धरम के ठुकरवले ना होखस ?

जवना रंग में युद्ध बोराइल बा,
धरम के दूर फेंकले ना होखस।

कालिख के टीका लगावे खातिर,
सब अंगुरी बोरले बाड़े कि जय होई;

साँच डगर त दुनो छोड़लन,
हाँफत बाड़न कि जय उनके होई।

एह मलपटिआ युद्ध में दहकत,

कतना दिन गोइल अब बीत;

द्रोण-कर्ण के रहते,
रहे आशा कि जाई कोई जीत।

साँच राह पर अड़ल रह के,
के कर्ण अस लड़त रहे ?
धरम डंडा से भुभना नीच के फोड़े में,
केहूँ ना उनका से बड़का रहे।

कवना ओरे भगलन पार्थ,
कर्ण दहाड़त खोजे लगलन;

सोझा-सोझी आ काहे ना,
अपना जोड़गर के देह देखवलन।

का गजरा, मुरई, भटकोइँया अइसने,
सेना के वीरन से खाली काम पड़ी ?

कि जे वीर कहत होखे अपना के,

ओकरो से हमरा भीड़े के पड़ी।

जहाँ लुकाइल होखस अर्जुन, सुनलऽ,
अब आपन हाथ बटोरत बानी;
अब दू रथी के बीचे होई युद्ध,

किरिया आज धरावत बानी।

होखे जोम तब भीड़ से बहरी
आके अर्जुन सोझा होखस,
के वा असल के जामल,
हम कि तू अब साबित होखे।

पर केशव अपने चतुराई से,
पार्थ के रथ दूरे-दूर दौड़ावत रहन;

डरे घेरले रहे फिकिर कि कतहूँ,

लड़ते बेरि अमोघास्त्र कहीं छोड़लन ।

प्राण पखेरू पार्थ के उडि हे
पांडवन के किस्मत फुटीहन।

छलिया कृष्ण एही से एगो,
नंयका युक्ति उपरइलन;
देबे खातिर कवर एकघनी के,

हिडिम्बा सुत के पास बोलइलन।

केशव कहलन सुनऽ घटोत्कच,
अब का देखात बाड़ ऽ;
जीत हाथ से जाये चाहत बा
फुटल करम पांडव के तोहरे हाथ में बाड़े।

देखऽ कर्ण के बाण डरवावन,
बरख के झड़ी लगावत बा;
सुधवा गाय अस पांडव सेना,
अब डरे भाग रहल बा।

समर भूमि में सगरो बस,
कर्णे के बाण बरसत बा;
तिल भर बाँचल ना जगहा
जहाँ केहू के थिर पाँव पड़त बा।

असहीं जब संउसे सेना,
मरघट पर सहजे सूते लगिहें;
तब काल्ह भोर के बेरिया,
कवन सेना ले रण में लड़िहें।

ई घड़ी बड़ा आफत के बा,
कइसे कर्ण के कड़गर बाण रोकायी?

सुनऽ घटोत्कच जइसे होखे,
रोकऽ विनाश पांडव के, करऽ उपाय।

ज्वालामुखी लागल की फूटल,
सागर में बड़ वानल उठल;
दानव गरजत तड़पत रण में,

डरवावन रूप धर कूदल।

साँचे राक्षस के अवते,
रण के रूप उल्टा हो गोइल
कौरव सेना के धीरज,
डर के मारे टूट गोइल।

राक्षस सब के हाथन में

ढ़ेरका कड़िअल संसाधन होला;
अइसनो होला जवना पर,
मानुस के कवनो जोर ना होला।

माया के हथियार के मार से,
कौरव सेना चींघाड़ उठल;
जान बचावऽ कर्ण एकरा से,
कौरव सेना हहकार उठल।

कर्ण बाण अपने बरसावत रहलें,

बे रोक टोक युद्ध में लागल रहलें।

बाणन के मार से राक्षस देह में,
कतहूँ छेद से खाली ना रहे;
तबहू ऊ राक्षस जानवर अस,
रूप भयानक धरत रहे।

कवनो विध से रूक ना सकल,
ओह दानव के आपन चाल;
दुर्योधन कहलें कर्ण से,
देखते आपन सेना के हाल।

का देखखत बाड़ऽ हे दोस्त,
ई चंडाल कबो मरी कि ना?
वीर कर्ण, विलखत सेना के,
कवनो उपाय से रक्षा करऽ
दोसर कवनो ना राह बचल बा
आँख मूंद एकध्नी छोड़ ऽ।

दुश्मन के माथ त दूर रहल,
आपन माथ बँचाई जा;
जाल में प्राण फंसल बा,
पहिले आपन फाँस छुड़ायी जा।

सुनते बात, मन कर्ण के डोलल,

चिहइले नयन, कुरुपति ओर घुमल;

अलचारी में गुनाह के आगे,
दुर्योधन के मुंडी हाँ में डोलल।

भीतर मन में कहलन कर्ण,
पार्थ उमर के बड़ धनी बाड़ऽ;
ई अइसन आइल बा घड़ी,
किस्मत हमरा के छलले बा।

एकध्नी के बल पर कर्ण,
अब तक बड़ा खुश रहत रहन;
देके कवच-कुण्डल इन्द्र के,
एकनी ऊ पवले रहन।

विश्वास रहे बिन डर भय के,
कइसनो युद्ध के जीत सकब;
सोच कर्ण, बाण के रहस बचावत,

एही बाण से अर्जुन के मारब।

एकध्नी नागिन के जीमे काल,
काल के बहना के पास मरण सटल;

मृत्यु के दहकत आग में,
यम के तेज ताप रहे सटल।

आग अस लप लप करत,
तरकश से एकध्नी छूट पड़ल;
चाँद से बढ़ के चमकत
समर में धधकत आग छूट पड़ल।

अपना भाग्य के ठोकर मार के,
राक्षस पर तेजप्रहार पड़ल;
आतुर होत दुर्योधन के देखते,
कर्ण के मुँह दोसर ओर घूमल।

हिडिम्बा सुत के जान गोइल,
सब लोग चिहा देखे लगले;
लौटल एकध्नी पास इन्द्र के,
नभ के चिरत उड़ गोइलें।

जब पर्वत अस चोटे चंडाल गिरल,

गिरला के धमके धरती धसल।

पांडव दल में बेचैनी के शोक उठल,

हा-हा के सगरो शोर मचल।

अर्जुन, भीम, नकुल, युधिष्ठिर,
ना केहू कोई वीर रहल;
जे भी जहवाँ जसहीं रहे
सब के सब विलपे लागल।

संउसे सेना भइल कठमरू,

अकुलाइल सब सोचत रहले’,
पर कवनो बात गजबे रहल,

नटनागर कृष्ण हँसत रहलें।

का कवनो संकट माथा से उठल,
का केकरो विजय तगमा मिलल।

कुछ ना कुछ भइल बात बा,

जे देख केशव के शंका मिटल।

युद्ध भले नीके से जीतल,
कौरव सेना के भल लागल;
सेना भले छेकलें घेरले,
जयकारी कर्ण के करे लागल।

लेकिन कर्ण निराशा में डुबलन,
समर से दूर बहुत हो गोइलें;

जय-जयकार सुहाइल ना उनका,

कवनो चिन्ता में डूबल रहलें।

पांडव सेना जब हारल रहे,
केशव के मन हँसत रहे;
जीतलो पर मन कर्ण के,
एने हारल अइसन रहे।

का साँच के बल पर,
युद्ध जीतल जा सकत बा ?
कि चहला पर छल-बल से
अकिल के डंडा से मार सकत बा।

कइसन किस्मत के मार पड़ल बा?
कइसन अनहोनी बात घटल बा?

रोवत होखे केहू कतहूँ,
मोती के भंडार लुटावत होखे;
केहू के अभिशाप ढ़ोवते माथ,
खुशी के हंसी लुटावत होखे।

कइसन गजब कहानी कर्ण के,

जिनगी में बटोराइल बडुवे;
देखी कइसन भगवानो उनकर,
भाग्य के लिखले, रचले बडुवे।

जे आफत के ढोई ना,
टूटल आसरा से खोली ना;
जे जंजीर के तोड़ी ना,
मरद का जे जोर लगाके चली ना।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह (रचनाकार)
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित कविता संग्रह “तपल करमजरू” से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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