
भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)03 जून।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में सोमवार को 15 दिवसीय प्रोडक्शन-ओरिएंटेड ग्रीष्मकालीन कुचिपुड़ी नृत्य कार्यशाला का शुभारम्भ एक प्रेरणादायी उद्घाटन सत्र के साथ हुआ। इस अवसर पर संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध कुचिपुड़ी नृत्यांगना गुरु वनश्री राव तथा उनके शिष्य एवं सहायक वाशिम राजा विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को कुचिपुड़ी की शास्त्रीय नृत्य परंपरा में गहन प्रशिक्षण प्रदान करना है, साथ ही प्रोडक्शन-आधारित शिक्षण एवं मंचीय प्रस्तुति की व्यावहारिक समझ विकसित करना भी है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता डॉ. पी. शंकर राव, सहायक क्यूरेटर ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने भारत की समृद्ध प्रदर्शनकारी कला परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों और रचनात्मक सहभागिता के महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का शुभारम्भ सुकन्या गुहा नियोगी, संग्रहालय सहायक द्वारा अतिथियों के स्वागत से हुआ। इसके पश्चात डॉ. सुदीपा राय, सहायक कीपर ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का अभिनंदन किया तथा इस प्रकार की पहल को कलात्मक प्रतिभाओं के विकास और सांस्कृतिक चेतना के संवर्धन हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
सभा को संबोधित करते हुए गुरु वनश्री राव ने अपनी कलात्मक यात्रा, अनुभवों तथा कुचिपुड़ी नृत्य की सौंदर्यपरकता एवं अनुशासन से जुड़े महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने प्रतिभागियों को इस प्रशिक्षण अवसर का पूर्ण लाभ उठाने तथा सतत अभ्यास एवं समर्पण के माध्यम से शास्त्रीय नृत्य परंपरा की गहन समझ विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
यह कार्यशाला गुरु वनश्री राव द्वारा परिकल्पित एवं नृत्यबद्ध (कोरियोग्राफ) की जा रही है जिसमें उनके विशेषज्ञ मार्गदर्शन में प्रतिभागी आगामी पंद्रह दिनों तक गहन प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य एक प्रोडक्शन-आधारित प्रस्तुति के साथ कार्यशाला का समापन करना है, जिससे प्रतिभागियों को नृत्य-रचना, मंच-शिल्प तथा प्रस्तुति कला का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके।
कार्यशाला का समन्वयन आयशा गराबडू, संग्रहालय सहयोगी द्वारा तथा सह-समन्वयन सुश्री सुकन्या गुहा नियोगी, संग्रहालय सहायक द्वारा किया जा रहा है।
संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि,इस कार्यशाला के माध्यम से संग्रहालय ने भारत की समृद्ध प्रदर्शनकारी कला विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ किया है। साथ ही, यह सीखने, सृजनात्मकता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए सार्थक मंच उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
