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लोक सभा अध्यक्ष ने विधि निर्माताओं से राष्ट्रहित के मुद्दों पर दलगत भावना से ऊपर उठकर कार्य करने का आग्रह किया।

लोक सभा अध्यक्ष ने बैठकों की संख्या कम होने और विधायी निकायों में सदस्यों के अमर्यादित आचरण पर दुःख व्यक्त किया।

RKTV NEWS/नई दिल्ली 29 अगस्त।लोक सभा अध्यक्ष,ओम बिरला ने आज विधिनिर्माताओं से राष्ट्रहित के मुद्दों पर दलगत भावना से ऊपर उठकर कार्य करने का आग्रह किया । उन्होंने विधानमंडलों की बैठकों की संख्या में कमी और विधायी निकायों में सदस्यों के अमर्यादित आचरण पर क्षोभ व्यक्त किया। भुवनेश्वर, ओडिशा में संसद और राज्य विधानमंडलों की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समितियों के सभापतियों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए श्री बिरला ने कहा कि विधानमंडलों में चर्चा-संवाद का स्तर कम होना चिंता का विषय है ।
श्री बिरला ने संविधान के कालातीत मूल्यों के बारे में बात करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय और अवसर की समानता न केवल हमारे संविधान की विशेषता है, बल्कि पिछले 75 वर्षों से भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का मार्गदर्शन भी कर रही है । डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए श्री बिरला ने कहा कि वह एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और वंचित वर्ग मर्यादा, सम्मान और समान अवसरों के साथ रह सकें। श्री बिरला ने आगे कहा कि दशकों में इस विजन को ठोस रूप दिया गया है, जिससे इन समुदायों के सदस्य भारत के राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों तक देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं जिससे भारत के लोकतन्त्र की परिपक्वता और समावेशिता का परिचय मिलता है ।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण समितियों के सभापतियों का पहला सम्मेलन 1976 में नई दिल्ली में आयोजित किया गया था। इसके बाद, 1979, 1983, 1987 और 2001 में सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और संवैधानिक सुरक्षोपायों के विभिन्न आयामों पर गहन चर्चा की गई । इस सम्मेलन का आयोजन दिल्ली से बाहर पहली बार किया जा रहा है।
श्री बिरला ने कल्याणकारी योजनाओं को समाज के वंचित वर्गों तक सही मायने में पहुँचाने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए सरकारी धन के प्रभावी उपयोग और सुदृढ़ निगरानी तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया और समावेशी विकास को गति देने में वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य वंचित वर्गों के उत्थान के उद्देश्य से सामाजिक कल्याण पहलों के लिए हर साल पर्याप्त संसाधन आवंटित किए जाते हैं । इसके साथ ही उन्होंने विकास के लाभ का समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए समय पर कार्यान्वयन और नियमित निगरानी के महत्व को भी रेखांकित किया। इस बात पर ज़ोर देते हुए कि सच्चा सशक्तिकरण वित्तीय सहायता से बढ़कर आत्मनिर्भरता, सम्मान और विकास के अवसरों को बढ़ावा देना है , अध्यक्ष महोदय ने अधिक जवाबदेह और परिणामोन्मुखी नीति कार्यान्वयन के माध्यम से सामाजिक न्याय और समावेशी शासन के प्रति संसद की प्रतिबद्धता दोहराई।
समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, श्री बिरला ने कहा कि समितियां संसदीय लोकतंत्र का मुख्य आधार हैं। सदन में चर्चा पर हावी होने वाली राजनीतिक बाध्यताओं के विपरीत, समितियाँ दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर मुद्दों की विस्तार से जाँच करती हैं और आम सहमति पर आधारित सिफ़ारिशें करती हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि समितियाँ, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समितियाँ, बजटीय प्रावधानों की बारीकी से जाँच करती हैं, योजनाओं के निष्पादन का मूल्यांकन करती हैं और यह आकलन करती हैं कि आवंटन का पूर्ण और प्रभावी उपयोग हुआ है या नहीं। उन्होंने कहा कि समितियों के प्रतिवेदन न केवल सरकार को जवाबदेह बनाते हैं, बल्कि सुधार के लिए बहुमूल्य मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियाँ निष्पक्ष रूप से कार्य करती हैं, और राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर केवल लोगों के हित में निर्णय लेती हैं। सदन में होने वाली चर्चाओं की तुलना में उनकी चर्चाएँ अधिक विस्तृत होती हैं, जो सरकार की नीतियों को स्पष्टता और दिशा प्रदान करती हैं तथा संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाने में मदद करती हैं। श्री बिरला ने बताया कि हमारी संस्थाओं की इसी ताकत से भारत ने अपनी नीतियों को वास्तविक सशक्तिकरण में बदला है, जैसा कि हाशिए पर पड़े समुदायों के नेताओं के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने में परिलक्षित होता है।
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि क़ानून के समक्ष समानता, क़ानूनों का समान संरक्षण और सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय की गारंटी देने वाले संवैधानिक प्रावधान भारत की प्रगति की आधारशिला हैं, श्री बिरला ने कहा कि संविधान की उद्देशिका में निहित ये आदर्श शासन की कसौटी और संस्थाओं के लिए मार्गदर्शी सिद्धान्त बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब समानता और न्याय के सिद्धांत अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेंगे, तभी लोकतंत्र सार्थक और सशक्त होगा।
श्री बिरला ने कहा कि पिछले साढ़े सात दशकों से भारत में सबसे वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। आज, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, वित्तीय संस्थान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे शैक्षिक सुधारों के माध्यम से सभी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए अवसरों का विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शिक्षा और सामाजिक न्याय साथ-साथ चलते हैं, तथा कमज़ोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा देश के नीतिगत एजेंडा के केंद्र में होना चाहिए।
श्री बिरला ने विश्वास व्यक्त किया कि इस सम्मेलन में सार्थक संकल्प, व्यावहारिक सुझाव और नवीन विचार रखे जाएंगे जिनसे सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में समितियों की भूमिका और सुदृढ़ होगी । उन्होंने कहा कि यहाँ होने वाले विचार-विमर्श से एक समावेशी और समतामूलक समाज के लिए भावी रणनीति तैयार होगी और 2047 तक सभी के लिए न्याय, समानता और सम्मान के मूल्यों पर आधारित विकसित भारत के सपने को साकार करने में मदद मिलेगी । उन्होंने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन के निष्कर्ष अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए दीर्घकालिक नीति निर्माण में मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
ओडिशा के मुख्य मंत्री, मोहन चरण माझी; केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री, जुएल ओराम; केंद्रीय शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान; राज्य सभा के उपसभापति, हरिवंश तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण संबंधी संसदीय समिति के सभापति, डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते ने भी इस अवसर पर विशिष्ट सभा को संबोधित किया। संसद और राज्य/संघ राज्य क्षेत्र विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण संबंधी समितियों के सभापति और सदस्य; ओडिशा सरकार के मंत्री और ओडिशा विधान सभा के सदस्य उद्घाटन समारोह में उपस्थित थे।
उद्घाटन सत्र के दौरान, ओडिशा विधान सभा की अध्यक्ष, सुरमा पाढ़ी ने स्वागत भाषण दिया और ओडिशा विधान सभा के उपाध्यक्ष, भवानी शंकर भोई ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
सम्मेलन का विषय ” अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण, विकास और सशक्तीकरण में संसद तथा राज्यक विधानमंडलों की समितियों की भूमिका” है। सम्मेलन का समापन 30 अगस्त, 2025 को ओडिशा के राज्यपाल, डॉ. हरि बाबू कंभमपति के विदाई भाषण के साथ होगा।

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