
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)16 फ़रवरी।भोजपुरी भाषा में अश्लील गीतों का प्रचार प्रसार बढ़ रहा है, द्विअर्थी गीतों का सामाजिक स्तर पर प्रचलन बढ़ा है। इससे समाज में खून खराबा ,लड़ाई झगड़ा और आपसी सौहार्द बिगड़ता जा रहा है। जबकि भोजपुरी एक प्राचीन,सर्वप्रिय और करोड़ो लोगो की बोलचाल की भाषा है। इस संबंध में भोजपुर एकौना के प्रसिद्ध भोजपुरी गीतकार व कहानीकार कुमार अजय सिंह ने भोजपुरी गीतों में अश्लीलता प्रश्न पर बताया कि भोजपुरी भाषा ना कभी अश्लील रही, ना है, ना होगी लेकिन कुछ लोगों की कलुषित भावना और सोच से संस्कारिक गीतों में नयापन लाने की कोशिश है। भोजपुरी भाषा एक संस्कारिक भावना है, विचार है, विरासत है, जो हमें बोल चाल,खेत खलिहान, घर द्वार, पढ़ाई लिखाई ,रहन-सहन ,खान पान, पहनावा बढ़ावा सब में परिलक्षित है। निम्न प्रकृति के कुछ असुर लोग
अपने आप को बड़ा रचनाकार कवि लेखक बनने की होड़ में इसे बदनाम करते हैं। इनमें लिखने पढ़ने की क्षमता भी नहीं है लेकिन वाद्य यंत्रों के माध्यम से,सोशल मिडिया,अपने स्तर से उच्च कोटि प्राप्त कर लेते हैं।युग बदलने के कारण युवा पीढ़ी प्रभावित हो रही है, इन्हें भोजपुरी की कोई जानकारी नहीं है, जरूरत है कि इन्हें प्राचीन इतिहास सभ्यता संस्कृति को गांव की गलियों से लेकर शहर के चौक चौराहों तक के लोगों को बताया जाए। द्विअर्थी गीतों पर इन्होंने कहा कि यह केवल अपनी दुकानदारी चलाने का एक कुत्सित प्रयास है। कुमार अजय ने बताया की एक लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के केवल गीत,नाटक, संगीत का आत्मसात कर लें महान रचनाकार बन सकते हैं।भोजपुरियत को कायम रखना होगा।भोजपुरी हमारी संस्कार और संस्कृति का पोषक है। भोजपुरी समाज को जोड़ने वाली जन जन की कर्ण प्रिय आवाज है तो दूसरी तरफ वीर, बलिदानियों, क्रांतिकारीयों , स्वतंत्रता सेनानियों की अमर गाथा है। इसकी वीरता साहस और पराक्रम के आगे विरोधियों के हाड़ कांप जाते हैं। इसके भाषा भाषियों को कोई सामने से आज तक हरा नहीं पाया है।अपनी मिट्टी व मातृभूमि के लिए सीने पर गोली खाना और फांसी के फंदे चुमना संस्कार रहा है।
