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नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात : नीरज सिंह

इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती पर दो सत्रों में कार्यक्रम संपन्न।

वेलेंटाइन के माहौल में कवियों ने प्रेम कविताओं का पाठ किया।

RKTV NEWS/आरा(भोजपुर )14 फरवरी।”नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात है।
प्रगतिशील-जनवादी कवियों ने जीवन में प्रेम किया, पर अपनी कविताओं में प्रेम पर कम ध्यान दिया। परंतु फैज इसके अपवाद हैं। उनकी विरासत हमारी साझी विरासत है, भाषायी और महादेशीय दोनों स्तरों पर। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित-उत्पीड़ित मानवता के प्रति इतना गहरा सरोकार रखने वाला उर्दू का ऐसा प्रासंगिक शायर दूसरा नहीं है।” आज महान इंकलाबी शायर फैज़ अहमद फैज की 114 वीं जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच द्वारा स्थानीय नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय के सभागार में दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जलेस के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने ये विचार व्यक्त किये। इस मौके पर सुरेश कांटक के कविता संग्रह ‘आईना हूँ मैं’ का विमोचन भी‌ किया गया।
अध्यक्ष मंडल के दूसरे सदस्य जसम के राज्य अध्यक्ष और कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने फ़ैज़ को समग्रता में पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि फैज भारत और पाकिस्तान दोनों की जनता के प्रिय शायर हैं। वे हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की विरासत हैं और हमारे संघर्षों के साथी हैं। अध्यक्ष मंडल के तीसरे सदस्य कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि फ़ैज़ भारत-पाकिस्तान विभाजन नहीं चाहते थे।
मुख्य वक्ता के बतौर युवा कवि और आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने आज के वक्त को अधिनायकवादी-फासीवादी, तकनीकी-सामंती समय के रूप में चिहिनत करते हुए कहा कि यह एक विकट दौर है जब पूंजी की संस्कृति ने घर-घर, गांव-गांव तक अपनी जड़ें जमा ली हैं। इसने साहित्य की दुनिया को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बड़े-बड़े नामवर साहित्यकार अपने मूल्यों और आदर्शों को ठुकराकर उनसे पुरस्कृत और सम्मानित हो रहे हैं। ऐसे समय में फ़ैज़ बहुत प्रासंगिक लगते हैं; क्योंकि उनमें कभी कोई विचलन नहीं आया।
इसके पूर्व संचालक सुधीर सुमन ने कार्यक्रम का आरंभ करते हुए
कहा कि फ़ैज़ इश्क़ और इंकलाब के शायर हैं। एक भूमिहीन किसान के घर में पैदा हुए फ़ैज़ साहब की जिंद‌गी का सफर, बेहद रोमांचक और संघर्षों से भरा हुआ है। एक ओर उनकी शायरी इश्क में मिलन और विरह की कोमल और मार्मिक अनुभूतियों से बुनी गयी है, वहीं दूसरी और तानाशाह सत्ताओं के प्रतिरोध के तेवर से भी युक्त है। वे सबके लिए आजादी, बराबरी और जनतंत्र के लिए ताउम्र लड़ते रहे। उन पर रूसी क्रांति और युवा सशस्त्र आंदोलनकारियों के संघर्षों और विमर्शों का गहरा असर था।

इश्क धुनकी है दुखों को धुनने का

कार्यक्रम का दूसरा सत्र प्रेम कविताओं के नाम था। काव्य पाठ की शुरु‌आत करते हुए संतोष श्रेयांश ने अपनी एक बिना शीर्षक की कविता में कहा- सर्द रात में/ हरी हरी दूब पर/ओस की बूंद की तरह / तुम आयी मेरी जिंद‌गी में।
सिद्धार्थ वल्लभ ने इश्क के बारे में कहा- जादूगर के मायाजाल की तरह नहीं होता है इश्क, कि बना रहे कोई दृष्टिभ्रम । अपनी दूसरी कविता ‘प्रेम बार बार पुकारता है’ में उन्होंने कहा- इश्क धुनकी है दुखों को धुनने का।
ओम प्रकाश मिश्र ने अपनी कविता में ऐसी दुनिया का खाका खींचा, जिसमें सारी अच्छी चीजें होगी।
सुमन कुमार सिंह ने फैज की नज़्म ‘रकीब से’ और चीड़ा’ शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। उन्होंने कहा –
जिन चिडियों ने पंख खोलकर
होड लगाई बाजों से
भरी धूप में फड़फड़ फड़की
चुज्जे पाले नाजों से
उस चिड़िया से मिलकर आया।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्रा ने राज़ खोला- मैने भी कभी किसी से प्रेम किया था। ममता दीप ने प्रेम के अहसास को कुछ यूं बयान किया- हर रिश्ते के इर्द-गिर्द वही छाया है।
रूपेंद्र मिश्र ने पुस्तकालय में मौजूद छात्रों और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारियों में लगे लोगों को सीख देते हुए कहा कि असफलताओं से निराश होकर गलत कदम नहीं उठाना चाहिए। बकौल फैज- दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है/ लंबी है राम की शाम मगर शाम ही तो है। उन्होंने अपनी कविता में कहा कि लिखना ही उनके प्रेम का आधार है। राकेश कुमार ओझा ने सुनाया- मेरे जीवन की प्राण वायु / अद्भुत तेरा बलिदान प्रिय। कवि कथाकार सिद्धनाथ सागर की कविता में माँ के ‘घट्टे पड़े हाथ’ को लेकर संवेदना
व्यक्त की गयी थी।
वरिष्ठ कवि रामयश अविकल ने अपनी भोजपुरी कविता में यह फ़िक जाहिर की कि- आपस में रहल ना सरोकार ए भाई/ के करता केहू पर उपकार ए भाई। विक्रांत ने अपनी कविता ‘कईसन ई दौर आइल बा’ में गांव के प्रेममय जीवन छोड़़कर समस्याओं से भरे शहर में आने की विडंबना को दिखाया। सुनील चौधरी ने मौजूदा लोकतंत्र में नेताओं के अवसरवादी और जन विरोधी-चरित्र पर सवाल उठाया।
अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- मैं पर्वतों-खाइयों को लांघकर तुम्हारे पास आयी। जितेंद्र कुमार ने सुनाया- तुम्हारी तकरीर में नमी नहीं है रहबर
नीरज सिंह ने मां की स्मृति और वर्तमान दौर में बदलती पारिवारिक स्थितियों का बयान किया। उन्होंने कहा- अपने दर से पुरखों के घर आए बच्चे। सुधीर सुमन ने ‘तुम्हारे साथ’ नामक प्रेम कविता सुनायी और आख़िर में फैज़ साहब की रचना- ‘चलो फिर से मुस्कुराएं’ को गाकर सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रकार और रंगकर्मी शमशाद प्रेम ने किया।

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