
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)22 जनवरी।जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के अंतर्गत कोईलवर प्रखंड के सकड्डी गांव में चल रहे दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ। इस कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं को फसल अवशेष प्रबंधन के बारे में जागरूक किया गया जिसके अंतर्गत मशरूम की खेती करने के बारे में विस्तार पूर्वक प्रशिक्षण दिया गया तथा मशरूम से जुड़े उत्पादों तथा प्रसंस्करण पर महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया ।जिससे ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में सहायता मिल सके। इस प्रशिक्षण का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, भोजपुर द्वारा किया गया। संस्थान के गृह वैज्ञानिक सुप्रिया वर्मा ने महिलाओं को ग्रामीण परिवेश में मशरूम उत्पादन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार पूर्वक जानकारी दी और बताया कि मशरूम की खेती करने के लिए जाड़े का मौसम उपयुक्त होता है जिसमें बटन मशरूम, मिल्की मशरूम और फ़्लोरिडा मशरूम की उन्नत प्रजातियों का उत्पादन किया जा सकता है । कृषि वैज्ञानिक डॉ. राम नरेश ने मशरूम के पोषण संबंधी लाभों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मशरूम की खेती न केवल पोषणयुक्त है बल्कि फसल अवशेषों को जलाने से होने वाले प्राकृतिक नुक़सान से भी भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाने में सहायक है। ख़रीफ़ मौसम के फसलों की कटाई के बाद पराली प्रबंधन की दिशा में मशरूम की खेती एक बेहतर विकल्प साबित हो रही है जिससे किसान न केवल अपनी फसल अवशेष का प्रबंधन कर पा रहे हैं बल्कि एक नये आय स्रोत को भी विकसित कर रहे हैं । उन्होंने मशरूम की खेती के विभिन्न वैज्ञानिक विधियों और तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। इस कार्यक्रम में तकनीकी सहायक अंकित कुमार उपाध्याय ने जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के अंतर्गत फसल अवशेष प्रबंधन के विभिन्न अवयवों पर प्रकाश डाला जिसमें मशरूम उत्पादन में उपयोग होने वाले उपकरणों की जानकारी दी। प्रशिक्षण में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया और इसे अत्यंत उपयोगी बताया। प्रशिक्षण में शामिल महिलाओं ने मशरूम की खेती से संबंधित जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और महिला सशक्तिकरण के लिए प्रेरित करेंगे।
