
प्रयागराज/उत्तर प्रदेश (डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 16 जनवरी। मातृ शक्ति- दुर्गा वाहिनी का अखिल भारतीय अभ्यास वर्ग का उद्घाटन सत्र 16 जनवरी 2025 को प्रातःकाल 11 बजे विश्व हिन्दू परिषद के सेक्टर 18 में महाकुम्भ शिविर में स्थित सांदिपनी सभागार में आरम्भ हुआ। यह अभ्यास वर्ग तीन दिनों (16, 17, 18 जनवरी 2025) तक चलेगा। आरम्भ में विहिप के केन्द्रीय सह संगठन मंत्री विनायक राव देशपाण्डे, महिला समन्वय की केन्द्रीय संयोजिका मीनाक्षी ताई पिशवे एवं दुर्गा वाहिनी की राष्ट्रीय संयोजिका प्रज्ञा महाला ने श्रीराम-सीता-लक्ष्मण की कांस्य प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन किया, एकता मंत्र का सामुहिक पाठ हुआ। सत्र का संचालन केन्द्रीय सह संयोजिका मातृ शक्ति सरोज सोनी ने किया। दुर्गा वाहिनी की सह संयोजिका पिंकी पंवार ने मंचस्थ अतिथियों का परिचय कराया। प्रस्ताविक भाषण दुर्गा वाहिनी की संयोजिका प्रज्ञा महिला का हुआ। उन्होंने कहा कि कुम्भ में महिला कार्यकर्ताओं को बुलाने का मन हुआ। धर्म रक्षा का भाव मन में लेकर जाना है, सामूहिक टीम वर्क और सेवा का संस्कार सीखकर जाना है।
विनायक राव देशपाण्डे ने अपने सम्बोधन में कहा कि कार्यकर्ता के विकास के लिए बीच-बीच में प्रशिक्षण वर्ग की आवश्यकता होती है। बाईबल में कहा है कि पुरूष की पसली से औरत का निर्माण हुआ, पुरुष के मनोरंजन के लिए महिला बनी, उसमें जान नहीं है। भारत दुनियाँ में अकेला देश है, जहाँ चराचर जगत में परमात्मा का वास मानते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में संतों की अखंड परम्परा है, लड़ने वाले वीरों की भी परम्परा है। विजयनगर साम्राज्य के कारण दक्षिण भारत अजेय रहा। महाराणा प्रताप के समय में उत्तर भारत अजेय रहा। शिवाजी के नेतृत्व में महाराष्ट्र अजेय रहा। पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में विजय अभियान। महापुरुषों ने अपने शौर्य और पराक्रम से भारत को सुरक्षित किया। एकत्रित अभियान नहीं चला। एक ही समय में सम्पूर्ण भारत में जागरण की प्रक्रिया नहीं हुई, अन्यथा देश तभी सुरक्षित हो जाता।
देशपांडे ने कहा कि सारे देश में एक ही समय में, एक ही पद्धति से जागरण की प्रक्रिया चले, इसीलिए विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई है। संविधान का पालन करते हुए, संविधान के दायरे में रहते हुए, देश के सभी कोने में राष्ट्र जागरण हो सके, इसीलिए विश्व हिन्दू परिषद काम करता है।
विनायक राव ने कहा कि हिन्दूओं पर अन्याय करना और ईसाई, मुसलमानों को प्रश्रय देना ही आज सेक्युलरिज्म है। स्वातंत्र्य प्राप्ति के बाद मिशनरीज वाले भारत से जाने वाले थे, लेकिन सेक्युलर नेताओं ने उन्हें रोक लिया। मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के समय में नियोगी कमीशन आया मध्य भारत प्रांत में। उससे धर्मांतरण की विभीषिका का पता पूरे देश को हुआ। राजनीतिक लोगों के इशारे पर देशभर में भाषा के आधार पर झगड़े शुरू हो गए। तो धर्मांतरण की बातें दब गईं।
स्वामी चिन्मयानन्द जी, गुरु जी गोलवल्कर के संवाद में विश्व हिन्दू सम्मेलन का निर्णय हुआ। विदेश में रहने वाले हिन्दूओं की चिन्ताजनक स्थिति की चर्चा की गई। त्रिनिदाद-टोबैगो में 40 प्रतिशत हिन्दू, हिन्दूओं का दमन होता था। चर्च में शादी करनी पड़ती थी, मन्दिर नहीं थे। उस समय के वहाँ के सांसद शम्भूनाथ कपिलदेव भारत आये। नेहरू जी से मिले, फिर गुरू जी से मिले। दादा साहब आप्टे ने तीन लेख लिखा था, विदेश में रहने वाले हिन्दूओं के बारे में, उसमें समस्याओं के उपाय भी लिखे थे। चिन्मय मिशन में बैठक 29-30 अगस्त 1964, श्रीकृष्ण जन्माष्टम को हुई। जैन, सिख, अकाल तख्त, बौद्ध सभी समुदायों के लोग उपस्थित थे। सब की उपस्थिति में लोगों के सलाह से विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हो गई। 23-24 जनवरी 1966 में कुम्भ में प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन कराया गया।
जिन सम्प्रदायों का निर्माण भारत में हुआ, जो सम्प्रदाय भारतीय जीवन मूल्यों को मानते हैं, ऐसे सभी लोगों के लिए विहिप काम करता था। हिन्दू कोड बील में लिखा है कि ईसाई, यहूदी, मुसलमान, पारसी को छोड़कर बाकि सभी लोगों पर लागू होगा, तो इनको छोड़कर बाकि सभी लोग हिन्दू हैं। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आधार पर समाज का जागरण करने के लिए विश्व हिन्दू परिषद का काम है। बट वृक्ष अक्षय होता है, वैसा ही अक्षय हिन्दू समज भी, इसीलिए अक्षय बट बोध चिन्ह तय हुआ।
सारे शंकराचार्य एक साथ आये। परावर्तन को मान्यता, राष्ट्रपति राधाकृष्णन का संदेश आया। 1979 में इसी कुम्भ में दूसरा विश्व हिन्दू सम्मेलन हुआ। सर्वे हिन्दू सोदरा, न हिन्दू पतितो भवेत वाक्य तय हुआ।
अमेरिका में विहिप के दस सम्मेलन हुए, यूरोप में पाँच हुए। विदेशों में विहिप का 30 देशों में काम है। अभी 80 हजार समितियाँ हैं। दो लाख समितियाँ बनाना है। 10103 प्रखंड में समितियाँ बनाना है।
संगठन, सेवा, संस्कार, सुरक्षा- चार प्रकार के काम हमलोग करते हैं। 32 हजार सत्संग, 2 हजार बाल संस्कार केन्द्र, 500 से अधिक मन्दिरों का निर्माण हुए हैं।
