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कोई मुझे बचाये रे!

कोई मुझे बचाये रे

पड़ा हूँ घोर विपदा में रे
कोई मुझे बचाये रे।

व्यथित हो मन विपदा से
खिन्न रहता दिन रैन रे
कोई मुझे बचाये रे।

सहन न कर पर्वत सी विपदा
बरसती रहतीं बदली सी आँँखें रे
कोई मुझे बचाये रे!

कौन सा रोग हुआ है मुझे
कोई वैद्य नहीं धर पाता उसे
गलती जा रही मम देह मोम सी
दवा न करती कोई काम रे
कोई मुझे बचाये रे।

काम न कर रहे हाथ पाँव मेरे
छोड़ दिया हैअन्न जल मुख ने
चल रही बस धीरे धीरे
पुरानी गाड़ी सी साँस रे
कोई मुझे बचाये रे।

रचनाकार: धर्मदेव सिंह

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