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चिराग

चिराग

दिवाभर जल सूरज
रजनीभर जल तारे
आलोक फैलाते धरा पर
अतःअब चिराग धरा से उठा
मन भीतर जलायें हम।

इसके भीतर जो
कालीअंधियारी जमी है
रोशनी कर उसे
मिटायें हम।

तिमिर में पड़ मन
रहा इधर उधर भटक
खा खा ठोकरें
जख्मी हो जा रहा यह
किधर जाऊँ किधर न जाऊँ
सूझ नहीं रहा इसे कुछ
अतः अब चिराग धरा से उठा
मन भीतर जलायें हम।

अंध में रहते रहते
विवेक गया है इसका मर
कर्तव्य गया है निज भूल यह ।

रोशनी न पा
गलत पथ चल
लड़ रहा विक्षिप्त सा
हर से यह
अतः अब चिराग धरा से उठा
मन भीतर जलायें हम।

रचनाकार: धर्मदेव सिंह

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