
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)20 अगस्त। सोमवार को संस्कृत-दिवस के अवसर पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा फ्रेंड्स कॉलोनी कार्यालय में संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रो बलिराज ठाकुर ने की।इस अवसर पर मुख्य-वक्ता के रूप में बोलते हुए संस्थान के अध्यक्ष आचार्य डॉ भारतभूषण पाण्डेय ने कहा कि गुरु-पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन कर अन्तेवासी एक माह तक सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्म का प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। श्रावण-पूर्णिमा के दिन श्रावणी उपाकर्म जो तीर्थ अथवा नदी-समुद्र के तट पर होता है, में ऋषि पूजन, व्रत आदि के द्वारा बाह्य एवं आभ्यंतर शुद्धि संपन्न कर वेदाध्ययन में प्रवृत्त होते थे। आचार्य ने कहा कि गुरुकुल परंपरा से प्रशिक्षण प्राप्त विद्यार्थी स्नातक होकर समाज कल्याण के कार्यों में अपने जीवन का विनियोग और सदुपयोग करते थे। संस्कृत देवभाषा है। इसके द्वारा समाज में दिव्यता का आधान होता है और संस्कृति तथा संस्कारों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। यही भारतवर्ष का वैशिष्ट्य है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रो बलिराज ठाकुर ने कहा कि देश में प्रतिदिन हिंसा और अराजकता की खबरें आती हैं।यह परिस्थिति जीवनमूल्यों और शिक्षा के क्षेत्र में आई भारी गिरावट के कारण निर्मित हुई है। संस्कृत के प्रचार-प्रसार से इस परिस्थिति को बदला जा सकता है। समाजसेवी शिवदास सिंह ने अधिक से अधिक संस्कृत विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के संचालन पर बल दिया। डॉ सत्यनारायण उपाध्याय और सत्येन्द्र नारायण सिंह ने संस्कृत को संस्कृति की आत्मा तथा विश्व कल्याण का सोपान बताया।इस अवसर पर सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में संस्कृत विद्वानों के सम्मान तथा संस्कृत विद्यार्थियों के प्रोत्साहन के लिए सरकार से प्रभावी पहल करने की मांग की गई। संगोष्ठी का संचालन मधेश्वर नाथ पाण्डेय, स्वागत भाषण सत्येन्द्र नारायण सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन कुमार सौरभ ने किया। वक्ताओं में राधा प्रसाद पाठक, विश्वनाथ दूबे, रंग जी सिंह, सुनील कुमार, राकेश मिश्र, जनार्दन मिश्र, मृत्युंजय चौधरी समेत कई प्रमुख शामिल थे।
