
आरा/भोजपुर (अतुल प्रकाश, सभापति,अखिल भारतीय जनहित परिवार) 22 जून।भारतीय समाज के इतिहास में कबीर पहले इस प्रकार की बातें और विचार किसी भी कवि ने नहीं व्यक्त किए थे।
कबीर ने हिंदू धर्मांध पर कटाक्ष करते हुए कहा कि
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़*
या ते तो चाकी भली पीस खाए संसार।
वहीं दूसरी ओर धर्मांध मुसलमानों को लताडने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ते मुसलमानों को लताडते हुए वे कहते हैं,,,,
कांकर पाथर जोडि के मस्जिद लयी चुनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय?
कबीर ने भगवान और गुरु की बात की बराबरी में वे गुरु को भगवान से ज्यादा ऊंचा स्थान देते हैं। वे कहते हैं,,,,
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय
*बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय।
कबीरदास अपनी सोच और विचारों से सामंती सोच और प्रथाओं के खिलाफ थे। वे धर्मांधता, पाखंडों और पुरातन पंथी सोच का विरोध करते थे, समाज में समानता और समरसता की स्थापना करना चाहते थे, इसलिए आज की स्वार्थी और समस्त जन विरोधी ताकतें कबीरदास को पसंद नहीं करतीं। उनको पाठ्यक्रमों से निकाला जा रहा है, जैसे उनको भुला देना ही चाहतीं हैं। इसी बारे में रामगोपाल भारतीय कहते हैं,,,
ये क्या हुआ दोस्तों हमारे जमीर को,
*भुला दिया है हमने गांधी बुध कबीर को।
हम यहां पर यही कहेंगे कि कबीर दास एक विचार थे, एक सोच थे। उन्होंने लोगों को वाणी दी, विचार दिए। उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता, वे कभी नहीं मरेंगे, उन्हें कोई नहीं मार सकता, वे सदा अमर रहेंगे। उनकी महानता और विरासत को भुलाया नहीं जा सकता आज आज इस बात की महती आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को, उनकी विरासत को आगे बढ़ाएं और समाज में हिंदू मुसलमान के नाम पर फैली नफरत का माकूल जवाब दें। इसमें कबीरदास हमारी सबसे बड़े काम के हैं।
