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भोजपुर:मतदाताओं की उपेक्षा से आर के सिंह हारे,बोले हनुमान का रोल अदा करनेवाले राम बाबू प्रसाद चौरसिया।

राम बाबू प्रसाद चौरसिया

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)08 जून।आरा सांसद और मंत्री आरके सिंह के हार पर चर्चाओं का बाजार गर्म है।मतदाता अपने अपने ढंग से उत्तर दे रहे हैं। इसके लिए एक पचासी वर्षीय , धार्मिक प्रवृत्ति, सामाजिक कार्यकर्ता, जो कई दशकों से जुलूस में हनुमान जी का रोल अदा करने वाले, उत्तरी नवादा और चौरसिया समाज के संस्थापक अध्यक्ष राम बाबू प्रसाद चौरसिया से जानकारी ली गई। यद्यपि इनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं लेकिन इन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी जी के कुछ कार्यों से मैं बहुत खुश हूं और उनका समर्थन भी करता हूं। लेकिन आर के सिंह की हार पर सीधे बोलते हैं कि मुझे इसके लिए कोई अफसोस नहीं है। आगे बताते हैं कि 10 वर्षों के कार्यकाल में इन्होंने कभी स्थानीय लोगों के बीच बैठना ,मिलना या बात करना मैनें कभी नहीं देखा देखा। इससे भी बड़ी बात यह है कि ये कभी निचले समुदाय के लोगों से ना मिले,ना जरूरी समझा और न अपना बनाने की कोशिश की। जिसके कारण आम लोगों से की दूरी बढ़ते गई जिसका प्रभाव वोट पर पड़ा और हार गए।इन्होंने बताया कि भाजपा के पवन सिंह का काराकाट से चुनाव लड़ना काला इतिहास बना। इनके कारण सामाजिक और जातीय संतुलन बिगड़ गया और वोट पर सीधा असर पड़ा जिससे हार का मुंह देखना पड़ा।
मैं जनहित में एक बार इनसे मिलने के लिए पावर ग्रिड में बुलाई गई बैठक में गया था। लिखित आवेदन के साथ जिसमें रेलवे में वरीय सदस्यों को मिलने वाले आरक्षण की सुविधा मिलने तथा पूर्वी गुमटी पर आने-जाने तथा व्यवसायियों के लिए रास्ता बनाने से संबंधित था।ये देर से पहुंचे और केवल आवेदन ले लिया गया । ना कोई बातचीत, ना कोई संज्ञान ना कोई सूचना तक नहीं दी गई जिससे मुझे व्यक्तिगत दुख हुआ। हालांकि यह मांग मेरा नहीं बल्कि सामूहिक था। इससे भी स्थानीय लोगों में घोर निराशा रही और नेगेटिव वोटिंग हुई।अब रही सुदामा प्रसाद की बात तो मैं इन्हें वर्षों से एक स्थानीय कार्यकर्ता, व्यवहारकुशल, जमीनी नेता और स्थानीय मुद्दों के प्रति संवेदनशील रहने वाले सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं।हर समय उपलब्ध ,सभी लोगों से मिलना जुलना ,बात व्यवहार ठीक रहा है। जिससे भी लोगों का रुझान बढ़ता गया।
आर के सिंह जी लंबें समय तक नौकरशाह रहे,काम करने का ढंग अफसर वाला रहा, स्थानीय लोगों से दिल से कभी जुड़ाव नहीं रहा।जिससे आम लोगों की समस्या ना सुने न उनके कान तक कोई पहुंचाने वाला था।ना कभी मिलने के लिए जनता दरबार लगा। धीरे धीरे मतदाताओं का आकर्षण कम होते गया।
नतीजा हुआ कि आम आदमी अपने आम नेता को वोट देने में ही भलाई समझी और सुदामा जी को वोट का प्रतिशत लगातार बढ़ते गया और विजयश्री मिली।
अंत में बताना चाहता हूं कि लोकतंत्र में मतदाताओं को ऐसे ही भगवान नहीं कहा जाता है। मतदाताओं की शक्ति है कि राजा को रंक और रंक को राजा का ताज पहना देता है। प्रधानमंत्री मोदी जी दलित,उपेक्षित लोगों को मान सम्मान करने, उनके पैर धोने उनकी पूजा करने में कभी कोताही नहीं बरती। लेकिन जनपद के मतदाताओं की घोर उपेक्षा हुई , उन्हें अनुपयोगी माना,सबके वोट का मान बराबर है इसपर कभी विचार नहीं किया गया।अपने लोगों से मंत्री जी घिरे रहे जो जनता के लिए काम नहीं बल्कि अपने आप को नेता दिखाने के लिए काम करते रहे। सच्चाई जानने का कभी प्रयास भी नहीं हुआ। अंततः उपेक्षित जनता जीत को हार में बदल दिया।
सुदामा जी को जीत की बधाई देता हूं और अपेक्षा रहता हूं कि उनके नेतृत्व में सभी मतदाताओं का मान सम्मान बढ़ेगा और जिले का विकास होगा।

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