आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)29 मई।स्थानीय जेल रोड स्थित दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में प्रवास कर रहे दिगम्बर जैन मुनि श्री 108 सुप्रभसागर महाराज ने अपने प्रवचन में उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि जैन दर्शन में भावना का महत्वपूर्ण स्थान है ।उन्होंने कहा कि विद्वानों के प्रवचनों को सुनकर सम्यक् दर्शन को शब्द रूप में समझ लेता है परंतु ” मैं शुद्ध आत्मा हूँ” ऐसा बोध या विश्वास उसको आत्मसात नहीं हो पाता। इसलिए वह “ज्ञानी” होकर भी शरीर की चेतना में ही जीता है। उसके भीतर यह भावना ही पैदा नहीं होती कि मुझे सम्यक् दर्शन या विशुद्ध आत्मा के दर्शन के साथ जीना है। दृढ़ भावना और संकल्प शक्ति के अभाव में वह शब्दों के तल पर ही भटकता है। आध्यात्मिक अनुभूति से वंचित रहता है। जैन दर्शन में सोलह भावनाओं की चर्चा की गई है। इन भावनाओं को आत्मसात करके ही कोई साधक परम मुक्तावस्था को प्राप्त कर सकता है। दर्शन विशुद्धि भावना प्रथम भावना है। सो, सम्यक् दर्शन और दर्शन विशुद्धि में तत्वतः कोई अंतर नहीं है। जैन दर्शन के अनुसार, मात्सर्य या ईर्ष्या एक दोष है जो मनुष्य को अन्य लोगों की सफलता या सुख को देखकर होता है। इस दोष के कारण, व्यक्ति अपने भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और दूसरों को बुरा भला कहने लगता है। इससे न केवल उस व्यक्ति का अहंकार बढ़ता है, बल्कि उसके द्वारा दूसरों के लिए जो निर्माणकारी भावनाएं होती हैं, उनका नाश हो जाता है। जैन धर्म में मात्सर्य को एक महत्वपूर्ण दोष माना जाता है, जो व्यक्ति के आत्मा को अधिकारियों और अन्य लोगों के द्वारा दुखी करता है। इसलिए, जैन धर्म में लोगों को इस दोष से बचना चाहिए तथा दूसरों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया की मुनिश्री का प्रवचन प्रातः 8 बजे से, आहारचर्या 10 बजे तथा संध्या 4:30 बजे से शंका समाधान का कार्यक्रम होता है उक्त कार्यक्रम में भक्तगण पहुंचकर धर्मलाभ ले रहे है।
