आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)27 मई।घुसिया विक्रमगंज ,रोहतास पूज्य जीयर स्वामी जी महाराज के तत्वावधान में आयोजित श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ अन्तर्गत श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर ब्रह्मपुरपीठाधीश्वर जगद्गुरु विधा वाचस्पति आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज ने रूक्मणी विवाह की दिव्य , मार्मिक, मनोहारी कथा सुनाई जिसे सुनकर भक्त भाव-विभोर होते रहे।
आचार्य धर्मेन्द्र जी ने कहा कि रूक्मणी जी श्री लक्ष्मी की ही अवतार हैं ।विदर्भ प्रदेश के राजा भिष्मक महाराज को रूक्मी सहित कई पुत्र थे ,लेकिन उन्हें कोई पुत्री नही थी। पुत्री प्राप्ति के लिए श्री लक्ष्मी मां का आराधना की।
मां! यदि प्रसन्न हो तो मुझे एक पुत्री दो! महालक्ष्मी ने कहा कैसी पुत्री चाहिए? महाराज ने कहा ठीक आप की जैसी! महालक्ष्मी ने कहा, मेंरे जैसा तो कोई नहीं, मैं ही तुम्हारी पुत्री बन कर आऊंगी! वहीं महा लक्ष्मी भिष्मक महाराज के पुत्री केरूप मे आई, नाम पड़ा रूक्मणी।रूक्मणी जी परम सुन्दरी,सुशिला और धर्मशीला हैं। रूक्मणी जी नारदजी के श्री मुख से द्वारकाधीशस के स्वरूप को सुनकर मन ही मन वरण कर लिया । भिष्मक महाराज भी द्वारकाधीश से विवाह करने के लिए सहमत हैं। लेकिन उनका जेष्ठ पुत्र रूक्मी तत्कालीन दूष्ट राजाओ का मित्र है जो द्वारकाधीश विरोधी और अपने मित्र शिशूपाल से विवाह करने पर अड़ जाता है ,विवाह की तिथि भी तय कर देता है ,विवाह की तैयारी होने लगती है। रूक्मणी जी और उनके माता-पिता को यह संबंध स्वीकार नहीं। रूक्मणी जी अपनी मनोदसा आधारित पत्र अपने कुल पुरोहित द्वारा द्वारकाधीश को भेजती हैं। द्वारकाधीश आसवासन देते हैं, घबड़ाने की जरूरत नहीं ,मैं समय पर आऊंगा, तेरी मनोकामना पूरी होगी।
कुलरीति के अनुसार रूक्मणी जी कुलदेवी पूजन के लिए जाती है, उसी समय द्वारकाधीश आते हैं, रूक्मणी को रथ पर बैठाकर चल देते हैं.. रूक्मी ललकारता है,रूकमी द्वारकाधीश से भयंकर युद्ध होता है ।रूकमी प्राजीत होता है, उसे द्वारकाधीश रथ में बांध देते हैं ,बंधक बनाते हैं, इसी समय बलराम भैया आजाते हैं और भयंकर युद्ध करने लगते हैं….. द्वारकाधीश रूक्मणी को द्वारका लेकर पहूंचते है,सारे संगे संबंधी आते हैं, वसंत पंचमी के दिन विधिवत रूक्मणी से श्रीकृष्ण का विवाह धूमधाम से संपन्न होता है…… इसके बाद एक एक करके सात क्रमशः जामवंती, सत्यभामा, कालिंदी ,सत्या, मित्र विंदा,भद्रा और लक्ष्मणा से विवाह संपन्न होता है ।इस प्रकार द्वारकाधीश का आठ विवाह संपन्न हुआ….प्रागज्योतिष पुर के राजा भौमासूर के कैदखाने में बंदी बनाई गई सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों की प्रार्थना पर उन्हें स्वीकार करते हैं…. आचार्य धर्मेन्द्र जी ने कहा इस प्रकार द्वारकाधीश को सोलह हजार एक सो आठ विवाह हुआ।सभी रानीयो से दस दस पुत्र और एक एक पुत्री होने की कथा कही। आचार्य जी ने कहा कि द्वारकाधीश पूर्ण रूपेण सद्गृहस्थ का जीवन व्यतीत करते हैं।अद्भुत शासकीय व्यवस्था की सुन्दर संरचना प्रस्तुत करते हैं,जो युग युग तक याद किया जाएगा, जो इस प्रसंग को कहेगा ,सुनेगा, अनुमोदन करेगा ,उसकी मनोकामना पूरी होगी।कथा में अपार जनसमूह उमड़ रहा है।
