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…..इधर किशोर बाबू जब घर पहुँचे तब तक कंचन स्कूल जा चुकी थी…: अनायास

RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)09 मई। डॉ कृष्ण दयाल सिंह की नाटक और कहानी संग्रह अनायास की पांचवीं रचना कहानी है “पहिल रोपनी”

फोटो सौ: सोशल मीडिया

पहिल रोपना (कहानी)

आधी रात के बाद गौ-सार में बछिया ने जब से हुँकार मारना शुरू ही किया था कि लखुआ की आँखों से नींद चली गयी। अब तो वह पूरब में कब चक्का लाल हो बस केवल इंतजार कर रहा था। आकाश अभी लाल चुनरी पहनने को शुरू ही किया होगा कि वह उठ बैठा । उठकर बिछावन समेटा और एक लोटा बासी पानी पिया, फिर ओठ के नीचे खैनी दबाकर झट शौच से निवृत हुआ । मेटा में से थोड़ा मुरहीं और एक भेली गुड़ गमछा में बाँधा । फिर एक लाठी ली और बाछी को खूँटा से खोलकर ले चला। सोचा जल्दी ही उसे सूँघा-लँघा कर पहर उठते काम पर हाजिर हो जायेगा। बाछी को खूँटा से खोला तो वह इतनी वेग से माकना शुरू की कि उसको काबू में रखने के लिए जोर लगाना पड़ा। हृष्ट-पुष्ट और बुलन्दी न रहे तो पहिलवठ का वेग भला कोई कमजोर थोड़े ही थाम सकेगा। काफी भोर में ही ले चला था। उस समय तक सड़क पर आदमी एका-एकी शौच के लिए निकलना शुरू ही किये थे कि वह दो मील चलकर फतेहपुर तक पहुँच गया था। रास्ते में कुरमूरी से ही हे-हा-हा, हे-हा-हा-हे जोर-जोर से बोलते जाता था, पर कहीं से भी साँढ़ का हकड़ना सुनायी नहीं पड़ा। ऐसा लगाकि सांढ़ गाँव-जवार छोड़ चुका है। जैसे-जैसे देर हो रही थी, बेचैनी बढ़ती जा रही थी, पर मन में ठाने हुए था अगर जाना भी पड़ा तो पीरो तक तो जायेगा ही। न होगा गर्भाधान केन्द्र से पाल ही दिलवा लेगा। और आखिरकार उसे पीरो तक जाना ही पड़ा ।
वहाँ पहुँचा तो पहले केन्द्र से एक टिकट कटाया, फिर बछिया को पाल दिलवाया। अब थोड़ा निश्चिंत हुआ। फिर वहीं पर दातून से दाँत साफ किया और जीभी-कुल्ला किया। कहीं खरायी न मार दे मुरहीं-गुड़ फाँककर नल से चार आँजुल पानी पीया। उसे अब जल्दी लौटने की चिन्ता थी। बड़े वेग से लौटने लगा। रास्ते भर सोचते रहा, आज तो काम पर कुछ देर हो ही जायगी, और मालिक की बात भी सुननी पड़ेगी। कभी मन में सोचता, बछिया तो मालिक की ही है न, वह तो केवल बटाई पर पाले हुए है। मालिक को बताने पर रंज थोड़े ही होंगे। भला अपना सामान थोड़े ही कोई खराब होने देना चाहता है। फिर किशोर मालिक पुराने मालिक से कम थोड़े ही समझ रखते हैं। इसी तरह सोचते, दौड़ते-हॉफते लौट रहा था। इधर बुधिया रोटी सेंककर उस पर थोड़ा नमक और सरसों का तेल घिसकर बिहारी को खिला रही थी। तभी लखुआ-लखुआ की आवाज लगाते मालिक का दूत राम बदन दरवाजे – तक आ गया था। बोला, लखुआ कहाँ है, मालूम नहीं, मालिक के यहाँ आज पहिल रोपना है ?
बुधिया तो पहले दूत की आवाज सुनकर सहम गयी पर पहिल रोपना की बात सुनकर बहुत खुश हुई। सोचने लगी, देर के लिए कुछ कह न दे कि लखुआ गया कहाँ है ? अभी रामबदन कुछ कहने ही को था कि लखुआ बाछी को लिये-दिये आ धमका। बाप को आया देख बिहारी खाना छोड़कर दौड़ पड़ा और बाप से यूँ लिपटा जाने कब का मिला हो। लखुआ ने बेटे को गोद में उठाकर चूम लिया, पर जैसे ही उसकी बढ़ी हुई दाढ़ी बिहारी के गालों में गड़ी, उसने अपना मुँह फेर लिया। लखुआ ने बेटे की पीठ थपथपाई और गोद से उतार कर फिर खाने पर बैठा दिया। तभी राम बदन ने चेताते हुअ कहा, देख लखुआ जल्दी जाकर परबतिया, मोहनी, सुगिया, फुलवा, भगजोगनी, विपत्ती और दिलबसिया सबके घर-घर जाकर रोपनी के लिए चला दे तथा बुटन, छोटन, झगरु, तपेसर और दलपत को बोझ करवाने के लिए भी कह देना । बुधिया तू भी सबको लेकर आहर के पास वाले दो बिगहवा टोपरा में पहुँच, और हाँ लखू बाद में तुम दोपहर को खेत पर घुघनी-पानी भी पहुँचा देना । एक बात और, खेत पर जाने के पहले भूलन बाबा के यहाँ शाम का अंगया-पानी भी दे आना। देख भूलन बाबा को अच्छी तरह से कह देना, समहुत के दिन भी वे नहीं आये थे ।
रामबदन इतना कहकर वहाँ से चला गया, जहाँ खेत से बिचड़े उखाड़े जा रहे थे। लखुआ सभी रोपवाली और कबरियों को चलाने के बाद भूलन बाबा के यहाँ चल दिया । इधर आज बुधिया बड़ी खुश नजर आ रही थी, क्योंकि मालिक के यहाँ पहिल रोपना जो था। वह जानती थी कि आज खेत पर तीन आँजुल घुघनी और एक ऑजुल भूजा महुआ तो मिलेगा ही। उसमें से कुछ बचाकर लायेगी और बिहारी को देगी। शाम का भोजन भी मालिक के यहाँ बिहारी के बाप को मिल ही जायेगा। मारे खुशी के झट-पट खाना खायी और खूब चटक सिंदूर माथे में लगायी और ललाट पर एक टिकली भी साट ली। फिर दरवाजे पर खड़ी होकर परबतिया, मोहनी, सुगिया…. की बाट देखती रही। सभी रोपवाली जैसे ही इकट्ठी हुई, बुधिया आगे-आगे चल पड़ी। रास्ते में सभी गीत गाते जा रही थी :-

हरि हरि रिम झिम बरसे मेघा,
मेढ़ आज तो उमड़ी ए हरि,
हरि मेढ़ आज जब उमड़ी,
सेज कोई तो घुमड़ी ए हरि ।

हरि हरि थर-थर काँपे देह,
मेह से भींगी तब ए हरि,
हरि साजन सेज जब घुमड़ी
तबहीं गात गरमायी ए हरि ।
बींज तब ही पड़ जायी ए हरि,
हरि हरि जब ही गात गरमायी,
हरि हरि बीज जब ही तो उपजी,
मन हरषायी ए हरि ।”

कभी गीत गातीं, कभी बातें करती सभी खेत की मेढ़ पर आ पहुँची । किशोर बाबू को वहाँ पहले से ही खड़ा देख सभी आनन्द विभोर हो गयी। पहिल रोपना के पहिल बन्ध पर सगुन के नेग तो मालिक से अब मिल ही जायेगा। बुधिया ने इन्द्र भगवान का नाम लिया, फिर बिचड़े का एक आँटी खोलकर भंडार कोने पर पाँच बन्ध्रोपा। किशोर बाबू ने झट दस रुपये का एक नोट बुधिया के हाथों थमाते हुए कहा, सब मिल बाँट कर ले लेना। आठ के बीच दस का एक नोट फिर भी उन्हें कम नहीं लगा। खुशी का दिया गया को थोड़ा कभी नहीं माना जाता है और गरीब तो फिर भी उसको बहुत मानते हैं। भावनाओं की तिजारत करना ये जानते ही नहीं। देखते-देखते सभी ने साड़ी का पल्लू घुटने के ऊपर चढ़ाया और खेत में रोप के लिए उतर गयीं।
बिचड़ो की ऑटियां पहले से ही थोडी-थोड़ी दूरी पर खेत में बिखेर दी गयी थीं। कुछ बोझा ढोनेवाले अभी तक बिचडे ला ही रहे थे। रोपने का काम शुरू हो जाने पर किशोर बाबू घर को लौट चले। इधर लखुआ भी पंडित जी के घर शाम का न्यौता देने चला ही गया था। यद्यपि लखुआ से भूलन बाबा की भेंट नहीं हुई थी, क्योंकि पंडितजी मंदिर पूजा करने चले गये थे। पूजा के बाद शंकर जी की बूटी का प्रसाद खाना तो उनके रोजनामचे में है ही। कब तक वह रुके रहता, फिर पंडिताइन को ही कह दिया। लखुआ को काम से फुर्सत ही किस दिन मिलती थी कि वह मंदिर भी कभी जा पाता। वह तो काम को ही पूजा समझता था। दिन-रात की मेहनत-मजदूरी करने पर तो कहीं घर के लिए नमक लकड़ी जुटा पाता था। पंडिताइन ने जैसे ही शाम का अंगेया-न्यौता सुना, उनके मुँह में पानी भर आया। वे यह भी समझ ही गयी कि आज शाम चूल्हा-चौका से फुर्सत । लखुआ ने बात अच्छी तरह समझा दिया था कि पंडित जी शाम खाने पर जरूर आयेंगे। आप याद करा. दीजिएगा, समहुत के दिन जैसा नागा नहीं करेंगे। पंडिताइन ने कहा, आज नागा काहे को होगा । समहुत तो सभी यजमानों के यहाँ एक ही दिन होता है, किस-किस यजमान के घर पहुँचा जाय, कहीं छूट भी जाता है। पहिल रोपना तो आज केवल किशोर यजमान के ही यहाँ है। लखुआ को समझते देर नहीं लगी कि अघाए साँढ़ से हरा-भरा खेत भी छूट ही जाता है।
जाने के पहले पंडिताइन ने लखुआ से बाहर धूप में पड़ी खाट को भीतर कर देने को कहा। भीतर कर देने के बाद जरा ओरचन कड़ा कर देने को भी कह दिया। लखुआ पंडिताइन के हुकुम को टाल भी तो नहीं सकता था, कहीं ऐसा न करने पर शिकायत मालिक तक न पहुँच जाय। सोचा आशीर्वाद के बल पर समाज के हर वर्ग से काम ले लेने का विशेषाधिकार तो पंडित वर्ग को मिला ही हुआ है। ओरचन कड़ा करना समाप्तकर जल्दी घर लौट आया । घर आकर प्याज रोटी खायी, फिर बिहारी को, दादी के पास करके अपने मालिक के यहाँ चल दिया। ज्योंही ड्योढ़ी पर पहुँचकर मालिक-मालिक कहते पाँव अन्दर को रखा, देखा कंचन बिटिया झूला झूल रही थी। लखू चाचा को देखते ही चाचा-चाचा कहकर बोल पड़ी। सुनकर लखू भाव विभोर हो गया। कंचन जब छोटी थी तो अपने घोड़ा बनकर कैसे इसे पीठ पर बैठाकर घुमाता था । आज जब कंचन स्कूल जाने लगी है, फिर भी उसी तरह याद रखे हुई है। सोचने लगा, बचपन सचमुच भोला होता है, यह तो उम्र है जो आदमी की आदमी से दूरी बढ़ा देती है। अमीरों की बोली में ऐंठन ला देती है, लखू से लखुआ तक बना डालती है। विटिया को अकेले ही पेंगा मारकर झुलते जो देखा, बस हाथों का सहारा देकर झूले को झूला दिया, उसमें गति आ जाने से कंचन खिल-खिलाकर हँस पड़ी। मालकिन पर नजर जो पड़ी बोला रोपनी का पन-पियाव बाहर कर दीजिए, उसे अभी लेकर खेत पर जाना है। पर मालकिन आज बहुत व्यस्त नजर आ रही थी। शाम को खाना क्या-क्या बनेगा की तैयारी में लगी थीं। देखा बरामदे में उरद की दाल भिंगोयी हुई थी, बेसन फेठकर अलग रखा हुआ था। चावल चून-बीनकर अलग सूप में ही रखा था, एक बाल्टी दूध भी रखा हुआ था और मालकिन एक खींचा लौकी अपने हाथ में लिए हुई थीं। दौरी में रखे हुए घुघनी-महुआ की तरफ हाथ के इशारे से मालकिन ने लखुआ को बताया। लखुआ ने दौरी को माथे पर उठाया और फिर बाल्टी-डोर तथा एक लोटा लेकर खेत की तरफ चल पड़ा ।
गाँव के बाहर अभी हुआ ही होगा, देखा मालिक छाता लगाये घर की तरफ आ रहे हैं। लखुआ ने हँसते हुए मालिक को सलाम किया, तो वे वस इतना ही बोले-समय-समय पर पानी पीला देना और काम पर निगरानी रखना । देखना खेत का अंश भी रोप के लिए छूटने न पाये। और हाँ ये तो बताया ही नहीं कि भूलन बाबा को खबर किया या नहीं? खबर कर दिया है कहकर लखू आगे बढ़ गया । खेत पर पहुँचा तो भरे दौरी को माथे से उतार कर मेढ़ पर रखा। बगल के इनारे से बाल्टी में पानी भर कर लाया। सूरज उस समय ठीक माथे पर खड़ा मालूम हो रहा था। रोपने के लिए जो पाह पकड़ ली गयी थी, उसके पूरा होते ही सबको मेढ़ पर आ जाने को कहा। मेढ़ पर आने के पहले सभी ने खेत के ही पानी में हाथ धोया। बारी-बारी से लखुआ ने हर किसी को चार आँजुल घुघनी और मूंजा महुआ मिलाकर बाँट दिया। बुधिया को भी उतना ही। बाह रे लखू ऐसी ईमानदारी, समय पड़ने पर तुम तो शैव्या के आँचल का चीर भी माँग सकता है।
सबको खाने के बाद बुधिया ने ही आगे आकर लौटे से पानी पिलाया और बाद अपने भी पीया। घुघनी में से थोड़ा बचाकर बिहारी के लिए बुधिया ने आँचल के एक खूंट बान्ध लिया। तभी दिलबसिया को मजाक सूझा, बोली,लखू क्यों नहीं बुधिया को अपने हाथों पानी पीला देते ? क्या मन है ? बुधिया भी खाट ओरचन कड़ा करके रख छोड़ेगी, फिर तो अलग-अलग कोर से ढलान भी मुश्किल हो जायेगी। इस ठिठोली पर दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा कर रह गये। फिर लखू ने सबको काम पर झट-लग जाने को कहा /देखते-दखते सभी ने फिर रोपना शुरू किया। रोप और साथ-साथ गीत भी चलता रहा। तभी राह चले जा रहे एक मनचले लड़के ने कहा-कहा क्या, रोपवाली को छेड़ा :

“रोप-रोप रोपनी, किशोरी जी के खेत, ना मिली घुघनी, ठेठाव आपन पेट ।”

इतना सुनना क्या था कि मोहनी ने उस पर कीचड़ यों उछाला, कि अगर जल्दी से वह भागा न होता तो उसको कीचड़ से भरा देखते ही बनता।
इधर किशोर बाबू जब घर पहुँचे तबतक कंचन स्कूल जा चुकी थी। कामिनी आइने की तरफ मुँह किये कानो में बाली डाल रही थी और उनके आने की इंतजार कर रही थी कि दोपहर हुए अभी खाना खाने आये नहीं । अभी कामिनी सोच ही रही थी, तभी किशोर पीछे खड़े होकर उसके सजे हुए रूप लावण्य को निहारते मंत्र-मुग्ध हो रहा था, तभी उसके अंगों में स्निग्धता व कड़ापन आ गये। अब तो उसकी भूख प्यास ही भाग गई। इस भूख को एक-दूसरे ही भूख ने दवा दिया। कामिनी का चेहरा उस समय ऐसा लगा रहा था जैसे दूध रहने पर पेन्हयी गाय। थन को हल्के से छूने पर भड़क की आशंका बनी हुई थी। जब अंगों में और स्फुरण होने लगा सोचा, बाहों के घेरे में कामिनी को कस लूँ। अगर इस वेसुधी में उसके हाथ का छाता गिरा न होता, घेरे में आने के पहले कामिनी को सुगबुगाहट तक न होती क्योंकि वह तो बाली एवं काजल में खोयी थी। वह क्या जानती थी, जिनके लिए श्रृंगार कर रही थी, वे ही चित्त’ चोरी किये हैं। किशोर केवल इतना ही कह पाये “रिमझिम दुपहरी में तुमने टोना लगाने का ठीक समय चुना है।”” कामिनी बस मुस्करा कर रह गयी और अपनी चंचलता को छुपाती हुई, रसोड घर में चली गयी। रसोई की थाल हाथ में लिये आयी, बोली पहले खाना तो खा लो, लगता है आज खेत से कुछ हरियाली चुरा लाये हो। मुझे त आज ढेर सारे काम करने हैं। किशोर ने खाना खाया, बात बनती नहीं देखक चुप चाप दलान में रखे खाट पर लेट गया । थकावटने नींद ला दी ।
शाम जब रोपा का काम समाप्त हुआ, सभी रोपवालियों न हाथ-पाँव धोये फिर चलकर मालिक के आँगने में पहुँचकर गीत गाने लगी :-

“सावन के रोपल गोरी, अगहन में ढेरी होइहें, गोरी के चूनरी तब हरीयर से पीयर होइहें, सबके नयनवा में एक आस लागल रही, कामिनी-किशोर मिली, फिर कब कंचन होइहे ।’

इस गीत से कामिनी के मन में एक गुदगुदाहट तो उठी पर अपनी मुस्कुराहट को आँचल से छुपाते अंदर चली गयी। फिर तेल-सिन्दूर लाकर सबको बाँटा । इसके बाद दो-दो ग्लास गुड़ और सौफ का शर्वत सबको पिलाया। अब उसने तराजू बटखरा से वजन करके रामबदन को सबको 5 मजदूरी का चार-चार किलो चावल देने को कहा। जब तक रामबदन तौलकर बारी-बारी से दैता रहा, कामिनी उन लोगों से घुल-मिलकर बातें करती रही और अपना प्रेम लुटाते रही। जब सभी रोपवाली अपने घर को जाने लगी, हाथ के इशारे से बुधिया को रोककर, कुछ लौकी का बजका और सूखी बरी लाकर दिया। जैसे ही बुधिया ने आँचल के खूँट पर बाँधा, उसकी आँखे स्नेह से छलछला उठी और देर तक दुआए भरती घर पहुँची। घर तो लम्बे डेग भरती यूँ पहुँची जैसे दिन भर चरने के बाद रंभाती गायें बछड़े के लिए दौड़ती खूँटे पर आती हैं। माँ के देखते ही दादी की गोद में बैठा बिहारी, बेतहाशा दौड़ते, फुफती पकड़ माँ की गोद चढ़ने को आकुल हो गया। माँ का मातृत्व भी दिन भर के थकान के बावजूद उमड़ पड़ा। बिहारी को गोद में उठाकर चूमा, फिर दरवाजे पर बैठकर दूध पिलाने लगी। तभी उसने धीरेसे आँचल से बँधे घुघनी, बरी, बजका को खोला और कुछ सास के हाथों, कुछ बिहारी 5 को दिया। बिहारी बड़े चाव से खाने लगा। गरीब के बच्चे को इतना भी कभी-कभार ही तो मिलता है। खाते-खाते बिहारी माँ से बोला “तू हर रोज पहिल रोपना में ही क्यों नहीं जाती माँ”? बुधिया बालपन की जिज्ञासा पर केवल मुस्कुरा कर रह गयी ।

शाम तो हो ही गयी थी, बगल के घर से गोइठे पर आग का एक अंगारा लाकर चूल्हा सुलगायी और खाना बनाने लगी। डेकची में थोड़ा चावल और आलू डाल दिया । भात-चोखा बना लिया। बिहारी के बाप के अलावे भी तो घर में तीन लोग हैं। खाने के बाद छन्ना तो केवल पंडित जी के ही अधिकार क्षेत्र में आता है। वह शायद ही खाने के अलावे मालिक के घर से कुछ ला पायें । खाना बनाकर उसने सास को खिलाया फिर बिहारी को, तब अपने खाना खाया। सोने के पहले सास और बिहारी को तेल लगाया। दिन भर कीचड़ पानी में रोपनी जो किया था पैर की अंगुलियों के गासे में पानी लग जाने से जलन हो रही थी। उसने पहले ते, भेंगरिया का रस निचोड़ कर लगाया, फिर तेल मल ही रही थी कि उनके आने के बारे में सोचने लगी, अभी तक आये क्यों नहीं। लगा सबको जागने के पहले से सोने तक का काम गरीव-मजदूरों के माथे ही क्यों मढ़ दिया गया है।

इधर भूलन बाबा जब किशोर के यहाँ जाने को तैयार हो रहे थे, पंडिताइन ने उनके हाथ में छड़ी थमाते हुए जल्दी लौटने को कहा। किशोर तो उनके आने का इंतजार कर ही रहे थे। पंडितजी के आने के बाद बड़े आवभगत के साथ अंदर ले गये। फिर कामिनी और कंचन दोनों ने पंडितजी को प्रणाम किया। पंडित जी ने सौभाग्यवती हो, आयुष्मान हो, का आशीर्वाद दिया। किशोर ने तब खुद ही लोटे में जल लाकर उनके हाथ-पाँव धुलाया । तबतक कंचन ने बरामदे में आसन लगा दिया। जैसे ही पंडित जी आसन पर बैठे, कामिनी ने भोजन का थाल सामने परोसा और किशोर ने ग्लास को रखकर जल से भरा। पहले तो पंडितजी ने आचमन किया फिर शंख बजाया और परोसे गये थाल में से कुछ अंश जमीन पर अग्रासन काढ़ रख दिया । अब बड़े ही चाव से थाल में आये मलपुए, खास्ता कचौड़ी, इलायची डाली खीर और आलू परवल का दम पेट भर खाया जब तक डकार को पानी से शांत नहीं किया। इसके बाद सजाव दही के ऊपर से माथा कटा हुआ भाग पूरे कटोरा भर मुट्ठन चीनी के साथ सामने रख दिया गया। दही खा लेने के बाद किशोर ने पूछा पंडित जी भोजन तो सुस्वादु और तृप्तिकारी था न ? सामने खड़ी कामिनी की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा-यजमान इसे लक्ष्मी ने नहीं, खुद अन्नपूर्णा का ही बनाया समझों। जबतक बाद में लखुआ बाहर पंडित जी का हाथ-मुँह धुलाता, किशोर ने कामिनी को छन्ना बाँधकर रखने को कहा। छन्ना को पंडित जी को पकड़ाने के बाद दस रुपये का नोट दक्षिणा में पैर पर रखकर आशीर्वाद प्राप्त किया। लखुआ को आदेश मिला लालटेन लेकर पंडित जी को घर छोड़ आये। लखुआ लालटेन लिए आगे-आगे, पीछे-पीछे पंटित जी घर पहुँचे। पंडिताइन अब तक उनके आने का इंतजार कर रही थीं।
जबतक लखुआ लौटता मालिक-मालकिन भोजन कर चुके थे। लहुआ के लिए जस्ते की थाल में भोजन निकालकर बाहर बरामदे में ही रख दिया गया था । लखुआ के आते ही मालकिन ने खाना खा लेने को कहा। यूँ रात भी काफी हो चुकी थी, फिर लखुआ ने सोचा खाने के सामान को घर पर ही क्यों न लेते चलें, जहाँ मिल बाँटकर खा लेंगे। ऐसे तो इस तरह का खाना गरीबों के नसीब में है ही कहाँ ? खाना लिए लखुआ घर पहुँचा। इधर कामिनी ने लखुआ के जाने के बाद दरवाजा बंद किया। तबतक कंचन सो गयी थी और किशोर की नजरों में अजब की हरकत होने लगी थी। दोपहर में कामिनी का बहाना कुछ और था, कंचन के स्कूल से आ जाने का डर ऊपर से था तब । पर अब तो पूरी रात रहेगी कामिनी बस बाहों में। पलंग पर कामिनी के आते ही किशोर ने छेड़ते हुए कहा “साजन सेज जव घूमड़ी गात गरमायी” “कामिनी किशोर मिली फिर कब कंचन होइहे” का अर्थ क्या होगा कामिनी । जबतक वह अर्थ बता पाती किशोर ने लालटेन बुझा दिया और हाथ को जोर बन्हा तक पहुँचा दिया, फिर दोनों… एक दूसरे को अपने में अंतर्लिप्त कर सो गये ।
लखुआ घर पहुँचा, विहारी सो गया था, केवल बुधिया इंतजार में बैठी थी। वह बोली खाना खा लो। ढ़िवरी का तेल खत्म हो चुका था, अंधेरे में ही लखुआ ने खाया और कुछ बिहारी के लिए बचाकर कठौती से ढ़ककर रख दिया। गरीबों में पारिवारिक स्नेह और सौहार्द कुछ अधिक ही रहता है, मिलकर कमाना और बाँटकर खाना उन्हें कहीं दूसरों से अधिक आता है। वहाँ संग्रह तो है ही नहीं जो वैमनस्य का कारण बन सके। थकी-मांदी बुधिया को नींद आ गयी, वह नहीं जान सकी वह कब सोया। लखू सोने के पहले सोचते हुए-पंडितजी, अपर्ने एवं बुधिया के परिश्रम एवं उससे मिलने वाले पारिश्रमिक की तुलना करते रहा। कभी कंचन का पेंगा मारना, तो कभी बिहारी का नमक घिसी रोटी खाना। कभी पंडित जी का मालपुआ खाना, तो बुधिया का घुघनी महुआ ।। कभी मालिक के माथे पर लगा छाता, तो कभी अपने माथे पर भरे दौरी का बोझ । कभी आठ रोपवालियों के बीच दिया दस का नोट, तो कभी दस रुपया का दक्षिणा दान। कभी पहिल रोपना के दिन भी बनीहार के घर गोइठे से चूल्हा सुलगाना, तो कभी अगेयां और छन्ना के भरोसे चूल्हा-चौका से फुर्सत । इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते सो गया, कि इसं तरह के बेमेल बँटवारे से उत्पादन बढ़ेगा भी, या बिना उत्पादन किये उपभोग पर वर्चस्व बना रहेगा। अगर परिश्रम के अनुसार बँटवारा हो तभी ज्यादा उत्पादन बढ़ना संभव हो सकेगा। पर कभी क्या यह हो भी पायेगा ऐसा पाहिल रोपना, या यूँ ही….।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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