
अब भी है दूर बहुत सावन!
बैशाख दिखाता है दहकन,
सूरज नित आग उगलता है।
काया के साथ-साथ मन भी,
प्रज्वलित अग्नि में दहता है।
अमराई सूनी- सूनी है,
कोयल है मौन साध बैठी।
क्या आप कर्ण से सुने कुहुक
अब भी है दूर बहुत सावन।।
लू हर -हर हर -हर चलती है.
यह धरती आग उगलती है।
साँसें माँगें जीवन भिक्षा
बस धीरे धीरे चलती है ।
उपवन मुरझाए दिखते हैं,
खो गई गुलाबो की महकन।।
अब भी है दूर बहुत सावन।।
तरुणाई बोझ उठाती है,
ईटा गारा रखकर सर पर।
छाया में बैठा हैट बूट,
जाने क्या कहता है फर फर
देख कर घड़ी गिनता रहता,
वह हाथ हिलाता है छिन छिन।।
अब भी है दूर बहुत सावन।।
पंछी गण छिपे घोसले में,
पशु बैठे तरु की छाया में।
दुबला पतला पगड़ी बांधे
एक कृषक पड़ा है माया में।
वह सोच रहा कैसे रक्षित, जीवन पाएगा भूतल जन ।
अब भी है दूर बहुत सावन।।
नदियों में रेत उभर आई,
को गई ताप पा तरुणाई।
जल जंतु दिखे आकुल व्याकुल,
खो गई अतल जल गहराई।
दुर्दशा कर रहा दावानल,
जाने कैसा हो जाता मन।।
अब भी है दूर बहुत सावन।।
