
गुब्बारे..!
तल्ख हकीकत से
टकराती नहीं तितलियाँ
लहूलुहान होने का डर
हवा में उड़ाता है
पर नोचने को आतुर
करीबी शैतानों को भूल
सपनों के नीलगगन में
करती हैं आकाश कुसुम की तलाश
नहीं रौंदती काँटों को
फूलों से मिला सौंदर्य
रोकता है कदमों को
उड़ती हैं पीछे-पीछे पराग के संग
मनमौजी हवा क्या जाने
पराग की चाहत क्या
तितलियाँ भटक जाती हैं
अनदेखी अनजानी घाटियों में
दिशाहीन पराग के पीछे पगलाई
हवा में पर भाँजती हैं
सुंदर पंख थक जाने पर
गुब्बारा बन जाती हैं तितलियाँ
रंगबिरंगे गुब्बारे उड़ रहे हैं
धोखेबाज अंदर-बाहर की हवा सहारे
नजर नहीं आता क्या
आप भी उड़ रहे हैं क्या?

