
लड़कियाँ..!
कुँवारी रह जाती हैं कुछ लड़कियाँ
किसी पीटी जाती हुई औरत को देखकर
किसी रोती हुई चाची को देखकर
कुँवारी रह जाती हैं कुछ लड़कियाँ
पिता की मजबूरी के कारण
दहेज की अनुपलब्धता के कारण
कुँवारी रह जाती हैं कुछ लड़कियाँ
अपने सुनहरे सपने के कारण
कुछ जिम्मेदारियों के कारण
कुँवारी रह जाती हैं कुछ लड़कियाँ
अपनी असीम आकांक्षाओं के कारण
फिर खींचने लगता है समाज
उनके चरित्र का स्केच
लिखने लगता है चारित्रिक पैराग्राफ
उन पर साइको होने का ठप्पा लगा कर
उनकी शादी न होने का
उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा कर।
कुँवारी रह जाती हैं कुछ लड़कियाँ
अपनी जिम्मेदारियों को
बखूबी निभाती हैं
नहीं मिलता समय अपने बारे में सोचने का परिवार को संभालने में जिंदगी
रेत की तरह निकल जाती है
सबको लायक बनाने में
अपने सपने कब परिवार में
तिरोहित कर देती हैं
फिर वही लड़की घर में
सभी की ऑंखों में खटकने लगती है
बोझ बन जाती है उसी पर
जिसकी बोझ को ढोते-ढोते
वह खुद उम्र की सीमा लाँघ जाती है
फिर घर में पुराने सामान की तरह
उपेक्षा का दंश सहती हुई
कुछ लड़कियाँ सच में कुँवारी रह जाती हैं।



