
सुकूँ ढूंढता ये दिल..!
सुकूँ….. ढूंढता ये दिल,
बेगैरत होता है अक्सर.. बनावटी रिश्तों में,,
टूट कर बिखरना हर रोज,
जिंदगी बँटी मेरी कुछ किश्तों में,,
सब जानकर भी अंजान बनने में भी क्या मज़ा है यारों,
लोग छुपते फिरते है जब रोज नये मुखौटे में,,
सुकूँ ढूंढता ये दिल….
बड़ी अदब से करते बेहयाई भी,
वो बड़े नामी- गिरामी है हस्ती में,
मुफ़्त में दे जाते हर सबक भी,
और इतराते चले हैं मस्ती में,,
सुकूँ ढुंढ़ता ये दिल….
(साभार शब्दों की सरिता मंच)



