
अनाचरण..!
अनाचरण के दृश्य देखिये,
गाँव शहर व बस्ती में।
कोलाहल है गली-गली में,
क्या होता है मस्ती में।।
ममता रोयें नेह विलखता,
प्रीति पीटती हैं माथा।
लाज लुटे नित बहनों की,
हर प्रभात में हैं गाथा।।
टूट रहा है धैर्य जनक का,
जननी के हिय पीर।
सब कुछ दिया विधाता ने,
जल में खींची लकीर।।
हैं परदेशों में पुत्र बस रहें,
आश्रमों में मात पिता।
होंठ है मुस्कान गजब की,
इच्छा की जले चिता।।
भ्रष्टाचार अनीत पल रहा,
गली गली में आह है।
मात पिता बे दवा जी रहे,
किन्तु संतानें वाह है।।
धर्य टूटता अब शब्दों का,
किसकी कहें व्यथा।
श्रीमान के अद्भुत कर्तव्य,
बीबी हैं गजब कथा।।
है मर्यादा के नाच हो नंगे,
संस्कारों की मौत है।
वनवासी यहाँ राम हो रहे,
राज चाहती सौत है।।
माँत हिये पीर क्या कहिये,
संतानों की हस्ती में।
पिता विलखता धर्य टूटता,
है व्यवहारी पस्ती में।।
(साभार “शब्दों की सरिता मंच”)




