
इंतजार हैं तेरा…!
बैठी हूं कबसे नजरों को बिछाएं
कहीं से कोई तुम्हारा संदेश आ जाएं
लागे है ऐसे सदियों से जैसे बैठी हूं मैं
दिल में छुपाके तेरी तस्वीर उदास हूं मैं
सोचूं कही बीते नहीं उम्र तेरे इंतजार में
पूछूं तेरा पता बहती हवाओं से
पूछूं पता तेरा उन कारें बादलों से
परेशान हूं तेरे जानिब, तेरी खैर की खबर पाऊं
डर है कहीं जहां में अकेली न रह जाऊं
तन्हाइयों में जीना मेरा दुश्वार हो जायेगा
बिन तेरे जीवन मेरा वीराना बन जाएगा
आते जाते रहे मौसमों के हसीं दौर
कहीं नहीं पाया तेरा पता किसी ठौर
लिए हसरतों को दामन में इंतजार में हूं
कहीं छूट न जाएं उम्मीदों के कारवां
उन्ही कारवां को बाहों में समेटे हुए हूं…
साभार “शब्दों की सरिता” मंच
