
मेरी खुशी
खुद से ज्यादा तुझे चाहा
पर तुझे कद्र ही नहीं ।
तुझसे क्या मांगा वक़्त के सिवा
पर मेरे लिए वक़्त ही नहीं ।
सोचती थी खास हूँ तेरे लिए
पर कभी थी ही नहीं।
तू खुश करने में लगा रहा औरों को मेरी खुशी की तुझे कुछ पड़ी ही नहीं।
तेरा – तेरा कह कह के ना जाने
कब किसी और का हो गया
इसकी हमको भनक ही नहीं।
तुम तो खैर अपनी जगह सही ही थे
बस हम ही तुमसे कुछ ज्यादा उम्मीद लगा बैठे।

