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भारतीय फासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का आह्वान!सुमन कुमार सिंह जन संस्कृति मंच के जिला सचिव बनाए गए।

आरा/भोजपुर 24 सितंबर।“फासीवाद को लेकर किसी विभ्रम में रहने की स्थिति नहीं रह गयी है। चुनावी लोकतंत्र से फासीवाद का अनिवार्य टकराव नहीं है। भारत में फासीवाद लोकतांत्रिक ढांचे का उपयोग करके आया है। सरकार और देश की आलोचना के फर्क को मिटा दिया गया है। आजादी, बराबरी और भाईचारा के जो आधुनिक मूल्य हैं, राष्ट्रीय आंदोलन की जो साझी विरासत है, फासिस्ट सरकार उसे मिटाने पर लगी हुई है। सरकार के विरोध को देशद्रोह के समान बताया जाने लगा है। इसके विरुद्ध हमें अपनी राष्ट्रीय स्मृतियों को जीवित रखने तथा साझी विरासत को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना होगा ।” आज दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, आलोचक और जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य प्रो. आशुतोष कुमार ने जन संस्कृति मंच, भोजपुर के प्रथम जिला सम्मेलन का उद्‌घाटन करते हुए ये विचार व्यक्त किये।
प्रो. आशुतोष कुमार ने कहा कि आज राज्य किसी एक व्यक्ति को भी आतंकवादी बता सकता है। सिर्फ कोई इरादा रखना भी देशद्रोह हो सकता है। किसका क्या इरादा है, यह भी सरकार अपने हिसाब से बताएगी। सोचने, विचार और बहस करने की संभावनाएँ निरंतर खत्म होती जा रही है। मीडिया, न्यायपालिका, मानवाधिकार जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं को लगभग खत्म कर दिया गया है। आज कई मुद्दों पर खुलकर बहस करने की स्थिति नहीं रह गयी है। भारत में हमसब फासीवाद की परिस्थितियों के बीच है। बुद्ध, कबीर, अमीर खुसरो, मीरा, बुल्ले शाह, फुले, गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह, नेहरू तक जो सांस्कृतिक प्रवाह है, उसे नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। फासीवादी ताकतें प्रतिक्रांतिकारी संस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं। उन्होंने कहा कि फासीवाद केवल शासकीय तानाशाही नहीं है, बल्कि तानाशाही फासीवाद में तब बदलता है, जब तानाशाह शासक को समाज से समर्थन प्राप्त होता है।
जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि यह भ्रम है कि फासिस्ट ताकतें विकास करती हैं। सच यह है कि अर्थव्यवस्था के स्तर पर हमारा देश बहुत पीछे चला गया है। आर्थिक विषमता, महंगाई, बेरोजगारी बढ़ी है। फासीवादी हमलों के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर बड़ी लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने कहा कि प्रतिगामी कला-संस्कृतिकर्म की सरकार खुलकर मदद कर रही है।
जनवादी लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने कहा कि 90 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और सांप्रदायिक उन्माद की संस्कृति के जरिए फासिस्ट राजनीति
मजबूत हुई। इस राजनीतिक-आर्थिक संस्कृति ने पूरे समाज को विभाजित कर दिया है। 1992 में मस्जिद को ढाह दिया गया और देश का बड़ा हिस्सा सिनेमा की तरह उसे देखता रहा। यह जो विचार और विवेक पर चौतरफा हमला हो रहा है, उसके विरुद्ध समाज को एकताबद्ध करना आज का जरूरी सांस्कृतिक कार्यभार है।
पत्रकार गुंजन ज्ञानेंद्र सिन्हा ने कहा कि यह सोचना होगा कि फासीवाद को भोजन-पानी-खाद कहाँ से मिलती है? यह अतीत की आहत अस्मिता से मिलती है; जिसे बहुत सुनियोजित तरीके से निर्मित किया गया है।
सम्मेलन के उ‌द्घाटन सत्र में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोजपुर के अध्यक्ष प्रो. बलराज ठाकुर ने कहा कि अभी तो भारतीय फासीवाद का क्रूर रूप आना बाकी है। प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से कवि ओमप्रकाश मिश्र ने भी जसम के सम्मेलन को शुभकामनाएँ दीं।
इस अवसर पर जनकवि कृष्ण कुमार’ निर्मोही गायक राजू कुमार रंजन, सुरेश राम, सूर्य प्रकाश, अमित मेहता, ने जनगीत प्रस्तुत किये। उद्‌घाटन सत्र का संचालन कवि सुमन कुमार सिंह ने किया।
सांगठनिक सत्र की अध्यक्षता जितेंद्र कुमार और कृष्ण कुमार निर्मोही ने किया। राज्य सचिव दीपक सिन्हा सम्मेलन के पर्यवेक्षक थे। सुमन कुमार सिंह ने सांगठनिक दस्तावेज का पाठ किया। इसके बाद युवानीति के पूर्व सचिव धनंजय, अरुण प्रसाद, कवि वल्लभ, गायक-रंगकर्मी राजू कुमार रंजन आदि ने दस्तावेज पर बहस में भाग लिया। सम्मेलन ने 21 सदस्यीय जिला परिषद और 7 सदस्यीय जिला कार्यकारिणी का चुनाव किया। सुमन कुमार सिंह को जसम, भोजपुर का सचिव तथा जितेंद्र कुमार को अध्यक्ष बनाया गया,
सम्मेलन में राजाराम प्रियदर्शी, सुनील श्रीवास्तव, कुर्बान आतिश, विक्रांत, आशुतोष कुमार पांडेय, सत्यदेव कुमार, प्रशांत, राजेश कमल, प्रशांत विप्लवी, अरविंद अनुराग, रवि प्रकाश सूरज, संजीव सिन्हा, विजय मेहता, रामयश अविकल, बृजभूषण प्रसाद, सुनील चौधरी, विजय कुमार सिन्हा, दिलराम प्रीतम, विष्णु ठाकुर, नंदजी आदि भी मौजूद थे।

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